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"सात दिन बाद आमावस की रात है। यह अमल आज सै शुरु होगा और आमावस की रात को पूरा होगा। आमावस की रात तू जगल में होगा डर मत, मैं भी रहूगा तेरे साथ । ठीक आधी रात के वक्त एक खास अमल करना पडेगा और उसके बाद यह सिद्धि पाकर तू एक बडा, जादूगर बन जाएगा। पर मन्ने एक बात बता--!" वह कुच्छेक क्षण इन्द्रजीत को घूरता रहा और फिर पूछा-"बडा जादूगर बनकर तू मौहै (मुझें) छोडकर तो नही चला जाएगा।"
' 'केसी बात करते बाबा। ' ' इन्द्रजीत जल्दी से बोला… ' 'मैं तुम्हें छोड़कर कहा और क्यों कर जाऊगा?"
"'तुम्हारा क्या भरोसा, इन्द्र?" कटारी उसके करीब आकय धीरे से बोली I इतने धीरे कि राजूमदारी भी न सुन पाया।
' 'ला अपना हाथ ओगे बढा... ।" राजूमदारी बोला- "और तू...कटारी तू पीछे हट जा… ।"
' 'यह ले बाबा... । ' ' कटारी पीछे हटते हुए बोली… ' 'हर कोई मुझें पीछे हटाता है। ' '
राजूमदारी ने कटारी की बात पर कोई ध्यान नही' दिया, लेकिन इन्द्रजीत ने मुडकर. उसे जरूर देखा। राजूमदारी ने इन्द्रजीत का हाथ थाम लिया था और अब उसने उसके अंगूठे' पर तेज धार चाकू की नोक से एक हल्का सा चीरा लगाया I चाकू की धार बहुत तेज थी फोरन ही खून उबल आया।
उसने अपने गले से उल्लू का पंजा' निकाला और कोई मत्र पढते. हुए इस पजे' की एक-एक उगली' पर खून लगाया-फिर इस खून आलूदा पजे को इन्द्रजीत के माथे पर फेरा, उसके माथे पर खून की लकीरें बन गई ।
"बस, जा इन्द्र-कमरे में जा। अब तन्ने (तूने) कमरे से सुरज निकलने से पहले नहीं निक्लना है। समझ गया ना, मेरी बात । चाहे तजे कोई कितना ही पुकारे-देख, अगर उसकी पुकार पर तू बाहर निक्ल गया तो इतना जान ले कि अंधा हो जाएगा।"
"ठीक है, बाबा! मैं अन्दर जा रहा हूँ अब सुबह ही बाहर निकलूंगा । ' ' इन्द्रजीत धीमे मे बोला ।
राजूमदारी फितरत से ही अम्बार था। यह सारा चक्कर उसने इन्द्र को जादू सिखाने के लिए नहीं चलाया था। यह अमल तो उसने इन्द्र को पूर्णत अपना गुलाम और आज्ञाकारी बनाने के लिए चलाया था I
हकीकत यहीँ थी कि कटारी ने इन्द्रजीत को राजकुमारी नयना से मिलते हुए देख लिया था और यह इतला उसने अपने बाप राजूमदाऱी को भी दे दी थी I राजूमदारी ने दुनिया देखी थी ।
काले इल्म का भी माहिर था । उसने अदाजा लगा लिया था कि ये तोता कुछ ही दिनों में उडने लायक हो जाएगा I सो, उसने न केवल इन्द्रजीत के पर काटने बल्कि उसे एक बडे पिंजरे' में बद करनै का बन्दोबस्त कर लिया था ।
हालात सजीदा' हो चले थे।
इधर राजूमदारी इन्द्रजीत को और अधिक किद में रखने की कोशिश कर रहा था तो उधर योगी दयाल ने उसै मत्र पाश से मुक्त कराने का अमल शरू कर दिया था।
योगी दयाल ने बाजार सै एक मीटर काला कपड़ा, एक नया उस्तरा, एक कोरी मिट्टी की हंडिया' खरीदी । फिर रात में उसने अपनी बस्ती से निक्लका एक पीफ्त की जड में छोटा-सा गड्डा खोदा, ह्रडिया' को उसमें रखकर देखा । ह्रडिया उसमें पूरी तरह नहीं आई। उसने गड्डे को थोडा' सा और बड़ा किया I जब ह्रडिया' पूरी तरह से गड्डे मै बैठ गई तो वह गड्डे क्रो वैसे ही खुला छोडकर, हडिया' को अपने साथ ले आया ।
घर में आका उसने दरवाजा अंदर से बद' किया । जलती लालटेन क्रो जमीन पर रखा और फिर हडिया', उस्तरा और काले कपडे को लेकर वह जमीन पर आसन जमाकर बैठ गया । ह्रडिया' को औधा करके उसने कुछ पढना शुरू किया। वह रूक-रूक कर उस्तरे को भी हडिया. पर मारता जाता था।
'फिर उसने हडिया' को सीधा किया…काले कपडे को अपने कंधे पर डाला। उस्तरा हाथ में पकडा और फिर दूसरे हाथ सै लालटेन कीं चिमनी उठाकर उसमें फूक' मारी। जलती लालटेन भडककर. बुझ गई। कमरे में पूर्ण अंधेरा छा गया l
इस अंधेरे… में हो योगी दयाल ने अपने कंधे से काला कपड़ा उतारा और तेज उस्तरे सै उसके तीन टुकडे कर दिए I फिर इस काले कपडे के दो टुकड़ों को और उस्तरे क्रो ह्रडिया में डाल दिया ओर तीसरे टुकडे को हडिया' के मुह' पर बांध दिया ।
और फिर... ।
अंधेरे में ही हडिया को दौनों हाथों में उठाकर घर से निकल पडा, ।
वह कुछ पडता… जा रहा था और हंडिया पर फूकता जाता था। यहाँ तक क्रि वह बस्ती से बाहर उस पीपल के नीचे पहुच गया जहां उसने कुछ देर पहले हंडिया' के आकार के बराबर गड्डा खोदा था।
योगी दयाल ने हडिया को उस गड्डे मै उतारने सै पहले अपने बाए हाथ सै गड्डे को टटोला, गड्डे में पानी भरा हुआ था । गड्डा पानी से भरा महसूस करके उसे बडी… खुशी हुई। यह प्रमाण था इस बात का कि उसका अमल सफलता की तरफ अग्रसर है ।
योगी दयाल ने खुश हो हडिया उस गड्डे में रख दी। काफी पानी उस हडिंया' में चला गया । और अब उसने उस गड्डे को मिट्टी से अच्छी तरह पाट दिया ।
गड्डे में मिट्ठी डालने के बाद उसने मिट्टी में अपनी एक उगली घुसेडी, और फिर लगभग आधे धन्टे तक उक्रडू' बैठा मत्र पढता, रहा। और फिर वह उठकर अपने घर आ गया और आराम से सो गया।
उसने इन्द्रजीत क्रो मत्र'-पाश सै मुक्ति का अमल कर दिया था।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
और फिर अगले दिन ।
प्रात इन्द्रजीत उठा तो वह प्रफुल्ल और प्रसत्रचित था । वह कमरे से वाहर आया। आगंन में चारपाई पर बैठी कटारी सब्जी काट रही थी । राजूमदारी अभी अपने कमरे में पडा सो रहा था।
इन्द्रजीत कटारी के पास आकर बैठ गया । कटारी का माथा ठनका । आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ था। कटारी के करीब बैठना तो दूर की बात वह कटारी को नजर भरकर देखता भी नहीं था।
सपेरे योगी दयाल ने इन्द्रजीत को हिदायत दी थी कि वह किसी भी तरह राजूमदारी के गले सै वह उल्लू का पंजा निकाल ले, जो राजू मदारी के तोर पर अपने गले में पहने रहता था । यह काम इन्द्र स्वय' नहीं कर सकता था । रात को उसे ख्याल आया था कि वह यह काम कटारी से करवाने की कोशिश क्यों न करे कि अगर वह कटारी पा थोडी-सी तबब्जो दे दे...उस पर यह जाहिर करे कि उसे उससे मुहब्बत होती जा रही है-और फिर वह कटारी के सामने उल्लू का पंजा अपने गले में डालने की इच्छा जाहिर करे तो कटारी यकीनन उसे खुश करने के लिए अपने बाप के गले से वह पंजा' निकालकर उसके हवाले कर देगी ।
यही सब सोचकर वह आज कटारी के निकट चारपाई पर आ बैठा था । नहीं जानता था कि वह जिन लोगों को फरेब देने चला है-बौ कैसे शातिर लोग हैँ। उन्होंने' तौ पहले ही उसके गिर्द जाल फैला रखा था और अपने बाप के आश्वासन के सदके ही कटारी के सपनों में रग भर आए थे। उसे विश्वास था कि वह वक्त ज्यादा दूर नहीं जब इन्द्रजीत अपना अतीत भूल जाएगा। उसकी याददाश्त जादू की भूल भुलैया में गुम हो जाएगी। फिर इन्द्रजीत उसका होगा और कोई उसे उससे न छीन पाएगा।
बहरहाल, इं-द्रजीत चारपाई पर उसके वेहद करीव आ वैठा तो कटारी का ध्यान टूट गया और दराती' से साग काटते हुए उसका हाथ बहक गया उसकी उंगली कट गई I
सी.....ऽऽऽऽ ! ' ' करके उसने साग परात में डाल दिया और अपनी ऊगली पकड़कर देखने लगी-जिससे झल झल खुन बहे जा रहा था I
!अरे यह तुमने क्या किया... । " इन्द्रजौत ने फौरन उसका हाथ थाम लिया और अपने अगूठे' से उसके जख्म को दबा दिया ।
इस प्यार भरे व्यवहार ने कटारी पर नशा कर दिया I वह अपनी पीड़ा भूल गई। उसने अपनी आखे बंद कर लीं । उसका जी चाहा कि इन्द्रजीत यूं ही सदियों तक उसका धाव दबाए बैठा रहे।
' 'अरे यह तो बहे जा रहा है । " इन्द्रजीत ने अगूठा' हटाकर देखा 'ठहरो में अंदर से कोई कपड़ा लाता हूँ। पानी में भिगोकर बांध दुगा तो खून बहना बद' हो जाएगा।"
"तुम मत उठना इन्द्र बहने दो खून । थोडा सा खून वह जाएगा तो क्या हो जाएगा। खून मेरे अन्दर बहुत है । कटारी ने अपनी आखें खौलकर कहा।
“पागल हुई हो। ' ' वह उठने लगा।
' 'इन्द्र, एक बात बताओ। ' ' कटारी ने उसे उठने नहीं दिया I
"हा , बोलो... । "
' 'देख, सच-सच बताना । ' ' कटाऱी इकरार करवाया।
"चलो, ठीक है सच-सच कहूंगा । " इंद्रजीत ने इकरार किया ।
' 'तुमने कभी प्यार किया' है? ' ' कटारी ने पूछा ।
“हा, किया है । " इन्द्रजीत ने उसे प्यार भरी नजरों से देखते हुए कहा "लेकिन यह मत पूछना-किससे? ' '
' 'इन्द्र, एक बात बताओ। ' ' कटारी ने उसे उठने नहीं दिया I
"हा , बोलो... । "
' 'देख, सच-सच बताना । ' ' कटाऱी इकरार करवाया।
"चलो, ठीक है सच-सच कहूंगा । " इंद्रजीत ने इकरार किया ।
' 'तुमने कभी प्यार किया' है? ' ' कटारी ने पूछा ।
“हा, किया है । " इन्द्रजीत ने उसे प्यार भरी नजरों से देखते हुए कहा "लेकिन यह मत पूछना-किससे? ' '
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' 'केसी बात करते बाबा। ' ' इन्द्रजीत जल्दी से बोला… ' 'मैं तुम्हें छोड़कर कहा और क्यों कर जाऊगा?"
"'तुम्हारा क्या भरोसा, इन्द्र?" कटारी उसके करीब आकय धीरे से बोली I इतने धीरे कि राजूमदारी भी न सुन पाया।
' 'ला अपना हाथ ओगे बढा... ।" राजूमदारी बोला- "और तू...कटारी तू पीछे हट जा… ।"
' 'यह ले बाबा... । ' ' कटारी पीछे हटते हुए बोली… ' 'हर कोई मुझें पीछे हटाता है। ' '
राजूमदारी ने कटारी की बात पर कोई ध्यान नही' दिया, लेकिन इन्द्रजीत ने मुडकर. उसे जरूर देखा। राजूमदारी ने इन्द्रजीत का हाथ थाम लिया था और अब उसने उसके अंगूठे' पर तेज धार चाकू की नोक से एक हल्का सा चीरा लगाया I चाकू की धार बहुत तेज थी फोरन ही खून उबल आया।
उसने अपने गले से उल्लू का पंजा' निकाला और कोई मत्र पढते. हुए इस पजे' की एक-एक उगली' पर खून लगाया-फिर इस खून आलूदा पजे को इन्द्रजीत के माथे पर फेरा, उसके माथे पर खून की लकीरें बन गई ।
"बस, जा इन्द्र-कमरे में जा। अब तन्ने (तूने) कमरे से सुरज निकलने से पहले नहीं निक्लना है। समझ गया ना, मेरी बात । चाहे तजे कोई कितना ही पुकारे-देख, अगर उसकी पुकार पर तू बाहर निक्ल गया तो इतना जान ले कि अंधा हो जाएगा।"
"ठीक है, बाबा! मैं अन्दर जा रहा हूँ अब सुबह ही बाहर निकलूंगा । ' ' इन्द्रजीत धीमे मे बोला ।
राजूमदारी फितरत से ही अम्बार था। यह सारा चक्कर उसने इन्द्र को जादू सिखाने के लिए नहीं चलाया था। यह अमल तो उसने इन्द्र को पूर्णत अपना गुलाम और आज्ञाकारी बनाने के लिए चलाया था I
हकीकत यहीँ थी कि कटारी ने इन्द्रजीत को राजकुमारी नयना से मिलते हुए देख लिया था और यह इतला उसने अपने बाप राजूमदाऱी को भी दे दी थी I राजूमदारी ने दुनिया देखी थी ।
काले इल्म का भी माहिर था । उसने अदाजा लगा लिया था कि ये तोता कुछ ही दिनों में उडने लायक हो जाएगा I सो, उसने न केवल इन्द्रजीत के पर काटने बल्कि उसे एक बडे पिंजरे' में बद करनै का बन्दोबस्त कर लिया था ।
हालात सजीदा' हो चले थे।
इधर राजूमदारी इन्द्रजीत को और अधिक किद में रखने की कोशिश कर रहा था तो उधर योगी दयाल ने उसै मत्र पाश से मुक्त कराने का अमल शरू कर दिया था।
योगी दयाल ने बाजार सै एक मीटर काला कपड़ा, एक नया उस्तरा, एक कोरी मिट्टी की हंडिया' खरीदी । फिर रात में उसने अपनी बस्ती से निक्लका एक पीफ्त की जड में छोटा-सा गड्डा खोदा, ह्रडिया' को उसमें रखकर देखा । ह्रडिया उसमें पूरी तरह नहीं आई। उसने गड्डे को थोडा' सा और बड़ा किया I जब ह्रडिया' पूरी तरह से गड्डे मै बैठ गई तो वह गड्डे क्रो वैसे ही खुला छोडकर, हडिया' को अपने साथ ले आया ।
घर में आका उसने दरवाजा अंदर से बद' किया । जलती लालटेन क्रो जमीन पर रखा और फिर हडिया', उस्तरा और काले कपडे को लेकर वह जमीन पर आसन जमाकर बैठ गया । ह्रडिया' को औधा करके उसने कुछ पढना शुरू किया। वह रूक-रूक कर उस्तरे को भी हडिया. पर मारता जाता था।
'फिर उसने हडिया' को सीधा किया…काले कपडे को अपने कंधे पर डाला। उस्तरा हाथ में पकडा और फिर दूसरे हाथ सै लालटेन कीं चिमनी उठाकर उसमें फूक' मारी। जलती लालटेन भडककर. बुझ गई। कमरे में पूर्ण अंधेरा छा गया l
इस अंधेरे… में हो योगी दयाल ने अपने कंधे से काला कपड़ा उतारा और तेज उस्तरे सै उसके तीन टुकडे कर दिए I फिर इस काले कपडे के दो टुकड़ों को और उस्तरे क्रो ह्रडिया में डाल दिया ओर तीसरे टुकडे को हडिया' के मुह' पर बांध दिया ।
और फिर... ।
अंधेरे में ही हडिया को दौनों हाथों में उठाकर घर से निकल पडा, ।
वह कुछ पडता… जा रहा था और हंडिया पर फूकता जाता था। यहाँ तक क्रि वह बस्ती से बाहर उस पीपल के नीचे पहुच गया जहां उसने कुछ देर पहले हंडिया' के आकार के बराबर गड्डा खोदा था।
योगी दयाल ने हडिया को उस गड्डे मै उतारने सै पहले अपने बाए हाथ सै गड्डे को टटोला, गड्डे में पानी भरा हुआ था । गड्डा पानी से भरा महसूस करके उसे बडी… खुशी हुई। यह प्रमाण था इस बात का कि उसका अमल सफलता की तरफ अग्रसर है ।
योगी दयाल ने खुश हो हडिया उस गड्डे में रख दी। काफी पानी उस हडिंया' में चला गया । और अब उसने उस गड्डे को मिट्टी से अच्छी तरह पाट दिया ।
गड्डे में मिट्ठी डालने के बाद उसने मिट्टी में अपनी एक उगली घुसेडी, और फिर लगभग आधे धन्टे तक उक्रडू' बैठा मत्र पढता, रहा। और फिर वह उठकर अपने घर आ गया और आराम से सो गया।
उसने इन्द्रजीत क्रो मत्र'-पाश सै मुक्ति का अमल कर दिया था।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
और फिर अगले दिन ।
प्रात इन्द्रजीत उठा तो वह प्रफुल्ल और प्रसत्रचित था । वह कमरे से वाहर आया। आगंन में चारपाई पर बैठी कटारी सब्जी काट रही थी । राजूमदारी अभी अपने कमरे में पडा सो रहा था।
इन्द्रजीत कटारी के पास आकर बैठ गया । कटारी का माथा ठनका । आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ था। कटारी के करीब बैठना तो दूर की बात वह कटारी को नजर भरकर देखता भी नहीं था।
सपेरे योगी दयाल ने इन्द्रजीत को हिदायत दी थी कि वह किसी भी तरह राजूमदारी के गले सै वह उल्लू का पंजा निकाल ले, जो राजू मदारी के तोर पर अपने गले में पहने रहता था । यह काम इन्द्र स्वय' नहीं कर सकता था । रात को उसे ख्याल आया था कि वह यह काम कटारी से करवाने की कोशिश क्यों न करे कि अगर वह कटारी पा थोडी-सी तबब्जो दे दे...उस पर यह जाहिर करे कि उसे उससे मुहब्बत होती जा रही है-और फिर वह कटारी के सामने उल्लू का पंजा अपने गले में डालने की इच्छा जाहिर करे तो कटारी यकीनन उसे खुश करने के लिए अपने बाप के गले से वह पंजा' निकालकर उसके हवाले कर देगी ।
यही सब सोचकर वह आज कटारी के निकट चारपाई पर आ बैठा था । नहीं जानता था कि वह जिन लोगों को फरेब देने चला है-बौ कैसे शातिर लोग हैँ। उन्होंने' तौ पहले ही उसके गिर्द जाल फैला रखा था और अपने बाप के आश्वासन के सदके ही कटारी के सपनों में रग भर आए थे। उसे विश्वास था कि वह वक्त ज्यादा दूर नहीं जब इन्द्रजीत अपना अतीत भूल जाएगा। उसकी याददाश्त जादू की भूल भुलैया में गुम हो जाएगी। फिर इन्द्रजीत उसका होगा और कोई उसे उससे न छीन पाएगा।
बहरहाल, इं-द्रजीत चारपाई पर उसके वेहद करीव आ वैठा तो कटारी का ध्यान टूट गया और दराती' से साग काटते हुए उसका हाथ बहक गया उसकी उंगली कट गई I
सी.....ऽऽऽऽ ! ' ' करके उसने साग परात में डाल दिया और अपनी ऊगली पकड़कर देखने लगी-जिससे झल झल खुन बहे जा रहा था I
!अरे यह तुमने क्या किया... । " इन्द्रजौत ने फौरन उसका हाथ थाम लिया और अपने अगूठे' से उसके जख्म को दबा दिया ।
इस प्यार भरे व्यवहार ने कटारी पर नशा कर दिया I वह अपनी पीड़ा भूल गई। उसने अपनी आखे बंद कर लीं । उसका जी चाहा कि इन्द्रजीत यूं ही सदियों तक उसका धाव दबाए बैठा रहे।
' 'अरे यह तो बहे जा रहा है । " इन्द्रजीत ने अगूठा' हटाकर देखा 'ठहरो में अंदर से कोई कपड़ा लाता हूँ। पानी में भिगोकर बांध दुगा तो खून बहना बद' हो जाएगा।"
"तुम मत उठना इन्द्र बहने दो खून । थोडा सा खून वह जाएगा तो क्या हो जाएगा। खून मेरे अन्दर बहुत है । कटारी ने अपनी आखें खौलकर कहा।
“पागल हुई हो। ' ' वह उठने लगा।
' 'इन्द्र, एक बात बताओ। ' ' कटारी ने उसे उठने नहीं दिया I
"हा , बोलो... । "
' 'देख, सच-सच बताना । ' ' कटाऱी इकरार करवाया।
"चलो, ठीक है सच-सच कहूंगा । " इंद्रजीत ने इकरार किया ।
' 'तुमने कभी प्यार किया' है? ' ' कटारी ने पूछा ।
“हा, किया है । " इन्द्रजीत ने उसे प्यार भरी नजरों से देखते हुए कहा "लेकिन यह मत पूछना-किससे? ' '
' 'इन्द्र, एक बात बताओ। ' ' कटारी ने उसे उठने नहीं दिया I
"हा , बोलो... । "
' 'देख, सच-सच बताना । ' ' कटाऱी इकरार करवाया।
"चलो, ठीक है सच-सच कहूंगा । " इंद्रजीत ने इकरार किया ।
' 'तुमने कभी प्यार किया' है? ' ' कटारी ने पूछा ।
“हा, किया है । " इन्द्रजीत ने उसे प्यार भरी नजरों से देखते हुए कहा "लेकिन यह मत पूछना-किससे? ' '
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