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A Horror Novel - स्वाहा complete

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गगा मोसी का दरबाजा बंद था । अमर ने हल्का सा धक्का दिया तो वह फौरन खुल गया और दरवाजा खुलते ही उसे जो कुछ नजर आया उसके होश उडा देने के लिए काफी था।

सामने देखा लिहाफा ओढे बैठी थी। वह बेअख्तयार ही आगे बढा, और मारे खुशी के लगभग चीखते हुए बोला--"अरे रेखा । तुम ।"

"जी भाई ! में ।" रेखा ने अपना हाथ आगे बढा दिया । अमर उसका हाथ 'थामते हुए बोला- ”वाकई! यह तो बडी. जबरदस्त खुशखबरी है-हम सबके लिए । "

"ओह । " गगा मौसी मुस्करा दी"यानि कि माया ने तुम्हें बताया नहीं था I "

"कमबख्त ने सिर्फ इतना ही बताया कि एक जबरदस्त खुशखबरी आपके कमरे में है और में...मै भी कहा अदाजा लगा पाया था कि यह खुबसुरत हो सकती है । "

"यानि कि ‘भाई मूझे भूला ही बेठे है। " रेखा ने जैसै शिकायत की।

"तुम्हें कौन भूल सकता है रेखा । " अमर सजीदगी' से बोला"हम तो रोज ही उस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश करते थे-लेकिन कुछ समझ में नहीं आत्ता था । तुम्हारी वह रहस्यमयी गुमशुदगी और फिर तुम्हारा वह खत । अगर वह खत न मिलता तो हम पुलिस की मदद जरूर लेते। "

"इसका मतलब है कि मेरा पत्र छोड जाना ठीक रहा।"

"हां I इससे हमें यह निश्चिन्तता तो रही कि तुम जहां भी गई हो अपनी मर्जी से गई हो । "

तभी दरवाजा एक दस्तक के साथ खुला और ट्रे उठाये माया ने अन्दर कदम रखा ।

"क्या लाई हो, माया?" अमर ने उसकी तरफ देखते पूछा।

"कॉफी लाईं हू साहब जी I क्या आप भी अण्डा लेंगे । "

"नहीं सिर्फ काफी"। मैं खाना खाकर आया हूं।"

माया ने जल्दी से अण्डा छीलकर छुरी से उसके चार टुकडे किए । उन पर हल्की-सी काली मिर्च डाली और प्लेट रेखा की तरफ बढा. दी I रेखा ने अण्डा खाकर कॉफी का मग हाथ मै ले लिया व धीरे धीरे दो चुस्कियां ली "भई वाह । " वह माया से बोली"सच ही में तुम्हारा जबाव नहीं । बहुत सादा कॉफी बनाई है । "

"हाय ।बीबी आप मुझे बहुत याद आती थी। "

"कोई खास वजह । "

"ऐसी दो प्यारी-प्यारी बातें सुनने के लिए । " माया ने मासूमियत से कहा । माया की इस बात पर तीनों ही हस दिंए थे।

माया कमरे में रुकना चाह रही थी । वह रेखा की कहानी सुनना चाह रही थी । अपनी जिज्ञासा मिटाना चाहती थी। उसे रेखा से वहुत लगाव था । रेखा ने उसे कभी नोकरानी नहीं समझा था । माया के साथ रेखा का रवैया हमेशा दोस्ताना रहा था, पर यह ऐसा मौका था कि वह चाहते हुए भी अपनी मर्जी सै कमरे में रुक नहीं सकती थी और उसे किसी ने रुकने को कहा नहीं सो वह तुरन्त कमरे सै निकल गई ।

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कुछ देर खामोशी रही ।। वै कॉफी चुस्कते रहे और इस खामोशी को अमर ने तोडा। उसने रेखा से पूछा--"क्या हुआ था तुम्हारे साथ? तुम कहा चली गई थी?"

रेखा को अमर की पूछताछ से ही खतरा था । उसके पास अमर के सवालों के जवाब नहीँ थे। जाहिर था अगर सच-सच बता देती तो किसी ने भी उसकी आपबीती पर विश्वास नहीं करना था । खास तौर पर अमर ने तो यही सोचना था कि "यह अपने चेहरे-मोहरे से तो पागल दिखाईं नहीं दे रही लेकिन बातें पागलों बाली कर रही है। "

अमर को आरम्भ में ही गंगा मोसी ने टोक दिया I वह एकदम बोली थी--"अरे अमर ॥ अब आ गई है तो सब बता देगी कि कहा गई थी? अभी तो यह खुद ही अपने आपे में नहीं है। फिलहाल तो इसे आराम की जरूरत है।"

"आपने ठीक कहा-मोसी! इसे आराम करने दिया जाए। सुबह बातें होगी । " यह कहकर अमर उठने लगा । "भाई अब ऐसी भी आराम की जरूरत नहीं है। " रेखा एकदम बोली--" आप कुछ देर तो बैठे। "

अमर रूक गया । कुछ देर तक इधर उधर की बातें होती रहीँ । इसी बीच गगा' मोसी ने उसे रेखा के भाई इन्द्रजीत के भी दिल्ली में बलदेव राज के यहां पहुचने' कीं खुशखबरी सुना दी ।

इन्द्रजौत्त के बारे में सुनकर अमर उछलते हुए बोला था "मौसी! सच-सच बताएं! आज सुबह आपने किसका मुह देखा था ? "

"क्यों? " मौसी उसे घूरने लगी ।

"देखिये ना-आज का दिन कैसा शुभ दिन है? खुशखबरी पर खुशखबरी चली आ रही हैँ । " अमर ह्रसकर बोला ।

"तुम्हारा ही तो देखा था । " मौसी ने मजाक किया।

"मजाक न करें। मेरे से पहले तो माया आपके पास आती है। '"

"हां । वाकई उठते ही सबसे पहले मैं माया की ही शक्ल देखती हूं। लेकिन वह तो मैं रोज ही देखती हू'। आज मैंने सुबह सुबह रेखा की तस्वीर देखी थी। यह मुझे आज बहुत याद आ रही थी ।" कुछ देर बैठकर अमर अपने कमरे में चला गया ।

इस बीच माया बर्तन उठाकर ले गई थी । गगा मौसी ने उसे रेखा का कमरा खोलने व ठीक करने को कह दिया था। उसे कह दिया गया था कि रेखा का कमरा ठीक करने के बाद वह अपने कमरे में सोने के लिए चली जाए । अमर के जाने के बाद गगा मौसी को अचानक बलदेव राज का ख्याल आया ।

"क्यों रेखा, तुम्हारे बलदेव अकल को फोन करें-अव तो तुम्हारी आमद सब पर खुल गई है। " उन्होंने-रेखा से कहा । शायद बलदेव को यह खुशखबरी देने को बेचैन हो रही थी वह ।

"बारह्र सै ऊपर हो रहे हैँ मोसी। " रेखा घडी पर नजर डालते बोली-- "अब तक तो अक्ल सो चुके होंगे।"

"ट्राई करके देख लेते हैं क्या पता जाग ही रहे हो। उन्होंने खुशखबरी सुनाई है तो इधर से भी उसका जवाब जाना चाहिये। हम क्यो पीछे रहे।" मौसी बोली ।

"चलिये ठीका मजा आएगा । " यह कहकर रेखा नम्बर डायल करने लगी ।सयोग से नम्बर फोरन लग गया। पहली घन्टी बजते ही रेखा ने रिसीवर मोसी की तरफ बढा दिया-"घन्टी बज रही है l " मौसी ने रिसीवर सम्भाल लिया।

तीसरी घंटी पर उधर किसी ने रिसीवर उठाया। जब हेल्लो कहा तो गगा' मौसी ने आवाज फोरन पहचान ली । वह बलदेव राज ही था।

"अभी सोये नहीँ बलदेव?“

"अरे गगा तुम । इस वक्त? खैर तो है? " वह परेशान हो उठे थे।

"भई हम भी कम नहीं तुमसे?" गगा के लहजे मे अल्हड सी शोखी भर आई थी ।

" अच्छा ! वैसे यह तो मूझे मालूम है, तुम बडी चीज हों।"
 
"प्रोफेसर बलदेव राज । मुझे 'चीज' न कहना । मैं गगा' हूं। एक सभ्रात-सूशील महिला । " गंगा का अल्हड़पन बड़ा ही अजीब था।

" अच्छा । सभ्रान्त और सुशील महिला I आप कुछ कह रही थीं।"

"तुम इस वक्त क्या कर रहे हो?" गंगा ने पूछा।

"हम सब इन्द्रजीत को घेरे बैठे है " बलदेव राज ने बताया-- “नई पुरानी यादें ताजा कर रहे है I "

"अच्छा अब एक धमाके की ख़बर सुनो-- मेरी रेखा भी वापिस आ गई है।" यह खबर बलदेव राज के लिए वाकई धमाकेखेज थी । वह तो जेसे बुत बनकर रह गया था। उसे बोलते न देख मोसी बोली "बलदेव...बलदेव... ।"

"म...मै सुन रहा हूं। " बलदेव राज मुश्किल से ही बोल पाया था--"कब आई?"

"तुम्हारी काल के आधे घन्टे बाद I " मौसी ने सविस्तार बताया-"...अचानक 'बेल' बजी। माया सो चुकी थी। उसे जाकर उठाया I मेरा ख्याल था कि अमर होगा I वह एक शादी में गया हुआ था I गेट खोला तो अमर के बजाय रेखा निक्ली I बलदेव, मैं तुम्हें बता नहीं सकती कि मुझें किस कद्र खुशी हुई... । "

''वाकई यह तो बडी धमाकाखैज खुशखबरी है I लगता है रमाकांत के दिन पूरे हौ गए।" बलदेव राज ने शुष्क स्वर में कहा फिर जेसे खुद को सम्भालते पूछा--"कहा' है रेखा?"

"यह मेरे पास बैठी है लिफाफ में... ।" मोसी ने रिसीवर रेखा की तरफ बढा दिया ।

”प्रणाम, अंकल। " रेखा ने चहकती आवाज में प्रणाम किया I

"जीती रहो, बेटी I " बलदेव राज भी कम उत्तेजित नहीं था--"रेखा तुम सकुशल तो हो।"

”हा', बलदेव अकल ! बिल्कुल सकुशल हूं। सकुशल, सलामत और खुश । "

"शुक्र है भगवान का ! पर तुम चली कहा गई थी?"

”अंकल-मै आपको बताऊगी'...सब सुनाऊगी' आप... । " रेखा ने टालने के लिए कहा "सुना है, भैय्या आपके पास हैँ केसे हैँ वह?"

"हां लो बात करो. .. I " बलराज वोला और फिर उसकी आवाज सुनाई दी--"इंद्र, लो अपनी बहन से बात करो मैंने तुम्हें रेखा के बारे में बताया था ना. .. । " फिर कुछ देर बाद इन्द्रजीत कीं आवाज उभरी । रेखा को इन्द्र के बारे में सब मालूम था, पर उन्है पहली बार बातचीत कर रहे होने का ड्रामा करना था ।

"रेखा ! मेरी बहना केसी हो तुम? " इन्द्र ने बेकरारी से पूछा था "कितना खुशनसीब हूं मै कि मेरी एक बहन थी I आह । जवाब दो बहना! मैं तुम्हारी आवाज सुनने को बेताब हूं।”

"मैं ठीक हूं भैय्या । भगवान बड़ा कृपालू है जो यह दिन दिखाया । जी चाहता है किं उडकर. आपके पास पहुच जाऊं...आपको नजर भर देखूं।"

"मेरी भी यही ख्वाहिश... ।"

"भैय्या आप बलदेव अकल के यहां केसे पहुच' गए? " रेखा ने अनजान बनते जिज्ञासा दिखाई।

"रेखा मैं तो मॉडल टाउन अपने घर पहुचा' था l अपना घर बद' पाया। एक चौकीदार था-उसी के साथ यहा अंकल के घर पहुच गया । रेखा, मेरी वहना यहां तो दुनिया ही बदल चुकी है I वीरान और उजाड़ हो गई ।। न मम्मी रहे न पापा रहे I शुक्र है कि तुम हो । जीने की कोई आस तो है I वर्ना मैं तो जीते जी मर जाता । मैं तुम्हें देखने के लिए बेचैन हूं मेरी बहन ! अब तुम् यह बताओ तुम दिल्ली आओगी या में वगलोर' आऊ" " इन्द्रजीत न अपना रोल बडी, खूबी से निभाया था I

"आप ही बगलौर आ जाएं, भैय्या । यहाँ गंगा मौसो से भी आपकी मुलाकात हो जाऐगी , फिर मै आपके साथ दिल्ली चलूगी !"

"ठीक है। मै क्ल बगलौर पहुच' रहा हूं फलाइट कमफर्म होते ही तुम्हें फोन करूगा। तुम एयरपोर्ट आ जाना । " इन्द्र ने फौरन ही अपना फैसला सुना दिया ।

"ठीक है। " रेखा बोली- "अब मिलने पर ही होंगी बातें । मुझे आपसे ढेर सी बातें करनी है, भैय्या।"

"ओ० के० गुडनाइट । " इन्द्र ने कहा व सम्बन्ध विच्छेद कर दिया ।

रेखा देर तक रिसीवर थामे खामोश बैठी रही।

”क्या सोचने लगी?" मौसी ने पूछा।

"आ हां। " रेखा चौंकी व फिर उसने रिसीवर रख दिया ।

"जरूर अपने भाई के बारे में सोचने लगी होगी l " मौसी मुस्कराई "पहली दार देखोगी अपने भैय्या को जो यकीनन अपने चाचा के जाल से बच निक्ला है I मैं तुम्हारी मनोस्थिति को समझ सकती हूं।"

एक झेंप सी रेखा के होंठों पर र्कोघी "हां, मोसी जाने क्रिस हाल मे होंगे भैय्या?खैर,अव मै अपने कमरे में चलूँ। " उसने इजाजत चाही ।

"आज मेरे पास ही क्यों नहीं सो जाती? " ममता भरे स्वर में बोली गंगा मौसी ।

"जेसा आप कहे, पर मैं थोडी देर के लिए अपने कमरे में हो आऊ । मुझें अपना कमरा बहुत याद आ रहा है। फिर कपडे भी बदलने हैँ मुझे । "

"हां,जाओ । " गंगा मोसी ने विरोध नहीं किया था ।

रेखा ने अपना बेग उठाया और बाहर निक्ल आई।

वह सीढिया चढ़ अपने कमरे में पहुची' और कुछ क्षणों तक इस कमरे क्रो निहारती रही । बडी राहत बडा. सुकून महसूस कर रही थी वह

उसने एक गहरी सास ली व अपना बेग खोला । बेग में दूसरी चीजों के अलावा दो तोहफे भी थे। पहले उसने हीरों वाला हार निकाला-ओर आइने के सामने खडे होकर उसे अपने गले में डाला । उसकी खूबसूरत गर्दन एकदम जगमगा उठी ।

उसे सरदार कासगन की याद आई जो उसे अपने मायावी लोक में रोकने का, ख्वाहिशमद था। कासगन के साथ ही उसका बेटा रासमोन भी याद आना स्वाभाविक था । रासमोन की याद पर उसके दिल की धडकने तेज हौ गई । रासमोन भी उसे कहां आने दे रहा था, पर अपने दिल के हाथों मजबूर होकर उसके आखिरी दीदार करने महल से बाहर आ गया था । दूसरा हसीन तोहफा रासमोन ने ही तो रेखा को दिया था ।

रेखा ने बेग में हाथ डालकर वह गुलाब की कली निकाल ली जो रासमोन ने उसके बालों में लगाईं थी। उसने कहा था कि यह कली कभी नहीं मुर्झाँएगी-और मुर्झां जाये तो समझना कि रासमोन इस दुनिया में नहीँ रहा।

वह कली अभी भी वैसी ही तरोताजा थी। उसकी महक से पूरा कमरा महक उठा था ।

रेखा धीरे-धीरे चलती हुई आइने के सामने आई और फिर उसने वह गुलाब की कली अपनी जुल्फो मेँ लगाने के लिए हाथ ऊपर उठाये तौ आवाज आई…
 
"ठहरो यह कली मैं खुद अपने हाथ से तुम्हारी जुल्फो में सजाऊगा।" और यह आवाज रासमोन की थी । रेखा के हाथ उठे के उठे रह गये ।

उसने चौककर आइने में देखा फिर फौरन पलटकर पीछे नजर डाली...दरवाजे कीं तरफ देखा । आइने में कोई था न पीछे कोई था और दरवाजा तो उसने अन्दर आकर बद कर लिया था बह वेसे ही बद' था ।

फिर वह आवाज !

वह आवाज निसन्देह रासमोन की थी, लेकिन रासमोन यहां कहा'? तो क्या यह रेखा का भ्रम था । ये शब्द, यह ख्वाहिश तो रासमान ने उसे बिदा करते वक्त जाहिर की थी । शायद रासमोन की आखिर ख्वाहिश उसे याद आ गई थी । उसने यह सोच जहन से झटक दी और साथ ही कली को बालों में लगाने का इरादा निरस्त कर दिया ।

उसने कली एक नाजुक से फूलदान में सजा दी और फूलदान में पहले सै लगे प्लास्टिक के फुत्त दुसरे फूलदान में ट्रासफर कर दिए। उसने यह फूलदान अपने वेड के साइड टेवल पर रख दिया । यह ऐसी जगह जहा' इस मह्रकती क्ली ने हमेशा उसकी निगाहों में रहना था ।

हीरों का हार भी गले से उतारकर उसने अलमारी के लॉकर में रख दिया।

वह बाहर निक्ली, दरवाजा बन्द किया व गंगा मौसी के कमरे का रुख किया।

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अगले दिन इन्द्रजीत बंगलौर पहुच गया था।

रेखा और अमर उसे एरपोर्ट लेने गये थे। शाम की पलार्हट अपने वक्त पर पहुच गई थी । दूसरों की नजरों में वे पहली बार एक दुसरे से मिल रहे थे-सो ड्रामा करने के लिए उन दोनों ने ही पहचान की निशानियां तय कर ली थीं। उन्हीं निशानियों के सदके दोनों ने अमर के सामने एक दूसरे को आसानी से पहचान लिया I इन्द्रजीत ने अपनी छोटी बहन को गले सै लगाया और फिर उसै निहारते हुए बोला--"तुम्हें पहचानने के लिए तो किसी निशानी की जरूरत न थीI .. "

" क्यो भैय्या? ”

"तुम्हारी सूरत मम्मी मे बहुत मिलती है। मेंने तुम्हें तुम्हारे नीले सूट से नहीँ-तुम्हारी शक्ल से पहचाना है। "

"फिर तो मुझे यही ककहना चाहिये था कि मैं मम्मी की हमशक्ल हूं। " रेखा ने हसते हुए कहा ।

"और क्या! जाने बलदेव अंकल को इस बात का क्यों ख्याल न रहा I" इन्द्र ने अमर की तरफ देखते हुए कहा, फिर उससे मुखातिब हुआ "आप यकीनन मिस्टर अमर है?”

"जी जनाब! !" अमर ने भी अपनत्व से कहा व अपना हाथ आगे बढा दिया।

"देखा मैंने कैसे पहचाना। " इन्द्र ने बडी. गर्मजोशी से हाथ मिलाया।

"मै हैरान हूं। आपने वाकई कमाल किया है। " अमर शालीनता के साथ बोला ।

"कोई कमाल नहीँ किया । " रेखा ने निकास द्वार से बाहर निकलते हुए कहा… "आप शायद भूल गये है अमर भाई कि मैंने फोन पर आपके सामने ही भैय्या को बताया था कि मेरे साथ आप होंगे । "

यह सुनकर वे दोनों ही हस दिये । वे गाड़ी में रवाना हुए । गाडी घर के गेट में दाखिल हुई तो गंगा मोसी बाहर बरामदे में मौजूद थी । रेखा ने इन्द्र के बारे में बता दिया । इन्द्र गाडी रूकते ही उतरा व तेजी से चलता बरामदे तक पहुचा I गंगा मौसी को प्रणाम किया व फिर अपना सिर उनके सामने नवां दिया । गंगा मौसी ने उसके सिर पर हाथ रखा और ढेरों दुआएं दे डाली ।

गंगा मौसी के पीछे माया खडी थी I वह बडी, दिलचस्पी से इन्द्रजीत कौ देख रही थी। गौर वर्ण इन्द्रजीत का व्यक्तित्व नीले सूट में खासा निखरा हुआ था और वह किसी भी नवयौवना को फिल्मी हीरो की तरह आ जाने वाला आकर्षण तो रखता ही था ।

"भैय्या यह माया है। इतने लजीज खाने बनाती है कि आप यहा से जाने का नाम नहीं लेंगे । " रेखा ने परिचय कराया "और मेरी तो सहेली है । "

”खूब । पर रेखा, हमें यहां से जाना तो होगा। " इन्द्र ने फ्राखदिली दिखाई--"ऐसा करेंगे कि माया को अपने साथ ले चलेंगे ।। "

“यह ठीक है I " रेखा हस दी। फिर माया सै बोली-- "माया, इनका सामान इनके कमरे में पहुचा दो। "

"जी, बीबी । " माया गाडी की तरफ बढ गई।

गगा मौसी. इन्द्र को अपने कमरे में ले गई । मौसी दोनों वहन भाई को एक साथ देखकर बहुत खुश थी । उन्होंने चाय इसी कमरे में एक साथ पी । फिर रेखा इन्द्र को अपने कमरे मे ले गई । इन्द्र ने एक निरीक्षणात्मक निगाह कमरे में चारों तरफ दौडाई फिर बोला "अच्छा तो यह है तुम्हारा कमरा? "

"हा, भैय्या । "

"अच्छा है। तुमने बड़े सलीके से डेकोरेट कर रखा हे ।"

"थेंक्स फार कम्पलीमेन्टस l " रेखा चहर्की ।

इन्द्रजीत्त की नजर सहसा गुलाब की कली पर पड़ी । वह बेड पर बैठकर कली को देखने लगा ।

"कितनी खुशबू है इसमें । कमरे में कदम रखते ही इसकी खुशबू महसूस हुई थी !"

"जी,भैय्या! " रेखा मुस्कराई "यह हमारी दुनिया की नहीँ है।”

"फिर । "

"यह रासमौन ने मुझे दी थी । विदाई तोहफा ।" रेखा ने बताया।

”वहुत हसीन तोहफा है ।"

रेखा एक गहरा सास लेकर रह गई। इस तोहफे के पीछे जो राज था, वह भाई को कैसे बताती? कैसे कहती कि इस कली में रासमैन के दिल की धडकनें बंद है?

"उधर दिल्ली के क्या हालात है, भैय्या?" रेखा ने मतलब की बात की तरफ आते पूछा ।

"चाचा रमाकात ने बसीयत के खिलाफ केस कर रखा है। उसका ख्याल है कि यह बसीयत जाली है । हमारे पापा के देहान्त के बाद उनका कोई वारिस नहीं रहा....कि तुम पापा की बेटी नहीं हो...क्योंकि उनकी जो बेटी हई थी, उसका देहान्त हो गया था…किं तुम उनकी 'नक्ली वेटी' हो और यह सारा ड्रामा उसने अपने दोस्त की जायदाद हडपने के लिए खेला है ।"

" ओह ।" रेखा ने गहरा सास लिया।।

"हां मुकद्दमा चल रहा है । बलदेव अकल' कह रहे थे कि अब तक यह साबित करना वाकई मुश्किल लग रहा था की तुम असली संतान हो । रमाकांत ने तो तुम्हारे 'डेथ सर्टीफिकेट' का विवरण भी अपने दावे के साथ लगा दिया है । पापा ने शायद तुम्हारी मौत क्रो हकीकत दिखाने को जाने कैसे 'शमशान भूमि' में दर्ज कराया था । ऐसै मे आदालत को यह यकीन दिलाना मुश्किल होता है कि एक बाप ने अपनी बेटी की मौत का ड्रामा क्यो किया । ऐसा काम कोई हौशमंद नहीं कर सकता। कानूनी प्वाइट से हमारा यह एक कमजोर पहलू था । मुकद्दमे की बुनियाद ही इसी पहलू पर थी कि तुम पापा कृष्णकात की असली बेटी हो या नहीं और अगर असली वेटी हो तो उनकी जमीन जायदाद की बारिस हो और अगर तुम उनकी बेटी नहीं हो तो फिर उनकी जायदाद का कोई बारिस नही । ऐसे में सारी जमीन-जायदाद हमारे चाचा रमाकांत के नाम ट्रांसफर हो जाती ।"

”...एक तरफ तो यह मुकद्दमा चल रहा है, दूसरी तरफ हमारा चाचा तलाश में हे ताकि तुम्हारी हत्या करवा कर के वह जाली वारिस से भी मुक्ति पा ले, इसीलिए बलदेव अंकल ने पापा के कत्ल के बाद तुम्हे फौरन बंगलोर भेज दिया था । "

"है भगवान ।।" रेखा बौली--"यह हमारा चाचा भी कैसा हिंसक आदमी है। जायदाद के लालच ने तो उसे भेडिया वना दिया है, भैय्या । इंसान' इस कदर भी गिर सकता है और वह भी सगा चाचा। "
 
"मुझें चाचा के इन इरादों का कुछ-कुछ अन्दाजा शुरू से ही था इसीलिए में सावनपुर जाता रहता था । चाचा. पापा को शुरू से ही धोखा देते आ रहे थे । मैने आते-जाते, जमीनों का हिसाब-किताब मांगना और देखना शुरू किया तो वह फोरन खटक गए। पापा को तो जमीन-जायदाद और रुपये पेसे से खास दिलचस्पी थी नही… इसलिए उन्होंने अपने भाई से कभी जमीनों की आमदनी का हिसाब नहीं मागा था। साल दो-साल में चाचा जो भी पापा के हाथ मे रख देता था-वही लेकर लोट आते थे। चाचा को चेक करने बाला कोई नहीँ था ।। जव मैने चेकिग की तो उसके कुछ ही समय बाद चाचा ने मुझे जंगलो' में कत्ल करने की साजिश रची और मुतमईन हो गये कि चलो, राह का यह काटा निकला । वह शेतान यही भूल गया था कि मौत और जिन्दगी तो प्रभु ने अपने हाथ मे रखी है । भगवान् ने मुझे मेरी मुश्किलो में भी जिन्दा रखा और अब एक बार फिर में उससे हिसाब लेने आ गया हू।"

"बलदेव अंकल अब क्या कहते है ?" रेखा ने चिन्तित स्वर में पूछा।

"उनका ख्याल है कि मै अभी रमाकांत के सामने न आऊं। यही बगलुर' में रहू तुम्हारे पास ।" इंद्र ने बताया--"और सच ही में वह हमारे वहुत वडे हमदर्द हैं। पापा के सच्चे दोस्त . अपना फर्ज वह बडी होशियारी और ईमानदारी से निभा रहे है । उन्होंने रेस्तरां को वहुत अच्छी तरह सम्भाला है। लकिन रेखा, यह वक्त छिपकर बैठने का नही है । रमाकांत ने एक मूकद्दमा किया है, मैं उस पर छ: मुकद्दमे टायर करूगां । उसने मेरे बाप को मारा है । मै उसके तीनो बेटों को खत्म कर दुगा ओंर यह सारे काम इतनी दूर बैठकर नही हो सकते । माडल टाऊन वाला हमारा बंगला बंद पडा है । मै उसी मे जाकर रहूंगा !" इंद्रजीत ने पुख्ता निश्चय के साथ कहा ।

”और मैं भैय्या !" रेखा ने जानना चाहा ।

"तुम यहीं रहोगी । उस वक्त तक जब तक मै तुम्हें दिल्ली न बुलवाऊ।"

"नहीं। मै यहां किसी कीमत पर भी न रहूगी। " रेखा ने विरोध किया… "मैं आपके साथ चलूगी । जहा आप रहेंगे, वहीँ मै । "

"ठीक है, रेखा । मैं तुम्हें भी जल्दी ही बुलवा लूगा । वहां के हालात तो देख लूं। " इन्द्र ने उसे टालने के लिए कहा ।

"मैं अब आपसे एक पल को भी दूर नहीं रहूगी । आप बहुत जल्द बुलवाने की बात कर रहे है। "

"बहुत जिद्दी हो। "

"मै तो आपकी गैर मुजूदगी में भी दिल्ली नहीं छोडना चाहती थी। वह तो बलदेव अंकल ने पापा कीं कसम देकर मुझे यहां आने पर मजबूर कर दिया था । " रेखा बोली ।

"जानता हूं। बलदेव अंकल ने मुझें बताया था । वैसे उन्होंने तुम्हें यहा भेजकर बहुत अक्लमदी का सबूत दिया । "

"यानि कि आप भी मुझे यहा छोडकर अक्लमद कहलवाना चाहते हैँ?" रेखा ने स्पाट भाव से आखें दिखाई ।

"नहीं गुडिया तुम मेरे साथ ही रहोगी । बेफिक्र रहो। "

"भगवान का शुक्र है कि मेरा भाई मेरे पापा जैसा न निकला। " पापा के प्रति दिल की शिकायत रेखा के होंठों पर आ गई थी।

”पापा बहुत शरीफ इन्सान थे, रेखा। मेरे अपहरण से बह खौफजदा हो गये थे। ऐसै में उन्होंने मजबूरन तुम्हें खुद से जुदा किया । रेखा, वह तुम्हें बहुत चाहते थे और नहीं चाहते थे कि तुम जालिम चाचा की भेट चढ जाओ । "

"उनका प्यार अपनी जगह, लेकिन मैं तो उनके प्यार से चकित रह गई।"

" अब मैं जो हूं। " इन्द्र जज्बाती हो गया ।

"मैं तुम्हें इतना प्यार दूगा कि तुमसे समेटा नहीं जाएगा। खैर, एक बात तो है रेखा कि जो लोग दूसरों को नुक्सान पहुचात्ते हैँ वह खुद भी कभी चैन सै नहीँ बैठते। "

”गलत । हमारे चाचा तो चैन से हैं और मजे उडा रहे हैँ I उनका तो - कुछ नहीं बिगडा।"

"एक अच्छी खबर सुनने को मिली है । " इन्द्र ने उसे चौंकाया।

"वह क्या?"

"चाचा के तीनों बेटों में फूंट पड़ गई. है । सुना है, तीनों ने ही रमाकांत से जायदाद के बटवारे की माग की है।"

"भगबान करे चाचा, जायदाद बाटने से इंकार कर दें, तब उन्हीं का कोई बेटा उनकी जान ले लेगा । " जले दिल से श्राप निक्ला था ।

"ऐसा होना कोई बडी बात नहीं I जब रमाकांत जायदाद के लिए अपने भाई को मरवा सकता है तो उसी जायदाद के लिए कोई बेटा भी अपने बाप को खत्म का सकता है।"

"ऐसा ही होगा। भगबान के यहां देर है अंधेर नहीँ। जो जैसा बोता है वैसा ही काटता है । " इन्द्र कुछ क्षण खामोश रहा। फिर उसने अचानक ही पूछा--"अरे हा रेखा। वह कमरा कहां है?"

"आप आराम करना चाह रहे हैं तो यही लेट जाएं और अगर अपने कमरे में जाना चाहते है तो चले मेरे साथ में आपको आपना कमरा दिखा दूं।"

"अरे, बावा मैं अपने कमरे की बात नहीँ कर रहा हूं। में उस 'भूतहा कमरे' क्री बात कर रहा हूं जिसर्की दीवारें काली हैं ।।"

"ओह वह कमरा।" रेखा बोली- "वह कमरा नीचे है । गगा मोसी के कमरे के बराबर कमरा है । "

"मैं उसे देखना चाहता हूं। " इन्द्र ने इच्छा व्यक्त की।

"हां, जरूर देखें! मैं खुद चाहती हूं किं आप वह कमरा देखें बड़ा ही अजीबो गरीब कमरा है !"

रेखा कुछ सोचते हुए बोली--“मौसी ने अगर हमें उस कमरे में जाते हुए देख लिया तो परेशान हो जाएगी,क्योंकिं जिस आमिल साबिक ने उस कमरे को ताला लगवाया था उसकी हिदायत थी कि उस कमरे को कभी न खोला जाए।"

"फिर मैं केसे देखूंगा'?" इन्द्र निराश हो गया ।

"रात को चलेंगे । एक बजे के बाद । जव सब सो जाएगे I " रेखा ने तरकीब बताई।

"ओह । ठीक है।" इन्द्र आश्वस्त हो गया।

रात का खाना सबने इकट्ठे खाया ।फिर अमर, रेखा व इन्द्र को गाडी. में घुमाने ले गया । गंगा' मोसी भी साथ हो ली थी । लुटकर आए तो काफी का दौर चला और फिर सुनने सुनाने क्री शुरूआत्त हो गई । गंगा मौसी ही नहीं अमर ढी इन्द्रजीत्त की आपबीती सुनने को बेकरार था ।

इन्द्रजीत्त ने सुनाया कि किस तरह उसके चाचा रमाकान्त ने उसके क्त्ल की साजिश क्री । किस तरह राजूमदारी नाम के एक जादूगर ने अपना नजरबदी का चमत्कार दिखाकर उसकी जान बचाइ । फिर किस तरह उस जादूगर ने उसे अपना गुलाम बना लिया । अब जादूगर के मरने के बाद ही वह आजाद हो सका।

इन्द्रजीत्त की आपबीती उन्होने मंत्र मुग्ध अवस्था में सुनी । जव वह अपनी आपबीती सुना चुका तो अमर ने बडी दिलचस्पी से पूछा

"फिर तो इन्द्रजीत्त साहब आपको भी जादू आ गए होंगे?"

"हा', आते हैँ। " इन्द्र मुस्करा दिया--"उस राजूमदारी ने कुछ खेल मुझे सिखाए थे और ये जादू से कम नहीं... ।"

"फिर कुछ दिखाइये ना । " अमर बड़े शोक से बोला--"कोई जादू हमें भी दिखाएं। "

इन्द्र सोचमूर्ण लहजे में बोला "यू तो मुझे कोई जादू दिखाये एक मुद्दत हो गइ है प्रेक्टिस नहीं रही फिर भी कोशिश करता हू। "

और तभी इन्द्र को ख्याल आया कि जब बकाल ने उसे रेगिस्तान की झोपडी में केद किया था तो उसे अपनी पसन्द की खाने पीने की इच्छा हाजिर करने के लिए एक मत्र सिखाया था। इस तिलस्मी मत्र द्वारा वह अपनी पसन्द की खाने कीं चीजें अपने सामने हाजिर कर लेता था।

उसने सोचा कि बकाल के सिखाये उस मत्र की शक्ति को आजमा कर देखे कि वह मत्र' यहा' इस लोक में भी कारगर है या उसका असर उसी मायावी रेगिस्तान में ही था और अब खत्म हो गया है।
 
इन्द्रजीत ने एक प्लेट मगवाकर अपने सामने रखी ओर मौसी से सम्बोधित होते पूछा "बताए मोसी! क्या खाएगी'?"

"नहीँ भई, मैं नहीं खा रही कोई चीज, पता नहीं कहा से मगबाकर देंगे।"

"ओ हो, मौसी । आप भी कमाल करती हैँ। मत खायेँ-पर किसी चीज को आने तो दें। " अमर बोल उठा। वह इर्स मामले में पूरी पूरी दिलचस्पी ले रहा था।

"आने वाली चीज को तुम खाओगे?" मोसी ने उसे घूरकर देखा।

"हा,, में खाऊगा । " अमर ने उन्हें चिढाने. के लिए कहा।

"इन्द्र जरा इसे लोहे के चने मगवा दो देखें, केसे चबाता है?” मौसी भी सुनकर बोली ।

सबने कहकहा लगाया। अमर खिसियाकर रह गया।

"अच्छा, मौसी मैं ऐसा करता हूं कि लोहे की बजाय मैं गर्म गर्म चने मगवा' देता हूं। " इन्द्र ने कहा व फिर सम्भलकर बैठ गया । उसने अपने जहन को एकाग्र किया फिर बकाल के सिखाये मत्र' क्रो होंठों हीं होठों में दोहराया और अपना हाथ प्लेट की तरफ बढाकर बोला

"गर्म-गर्म चने। "

इन्द्रजीत को एकदम सै एक झटका-सा लगा जेसे उसने बिजली के नंगे तार को छू लिया ही और प्लेट खाली की खाली रही। रेखा ने उसे झटका खाते देखा तो परेशान हो गई । वह घबराकर बोली

"क्या हुआ भैय्या। "

“एक जादू बेअसर हो गया। " इन्द्र निराशा से बोला-- "लगता है वहां की चमत्कारी शक्तियां वहीँ रह गई है।"

" अच्छा ही हुआ है I " रेखा ने लापरवाही सै कहा ।

"ठहरो अभी एक और जादू अजमा कर देखता हूं। " इन्द्र ने कहा और फिर वह अमर से सम्बोधित हुआ "अपनी घडी उतारे । "

एक व्यगपूर्ण' मुस्कान के साथ अमर ने अपनी घडी. उतारकर इन्द्र के हाथ में दे दी । इन्द्र ने वह घडी अपने दोनों हाथों में बन्द कर ली । फिर अपने दोनो हाथ घुमाकर एकदम खोल दिये। अमर का ख्याल था कि घडी एकदम हाथ से नीचे गिर जायेगी, लेकिन ऐसा न होकर घड़ी गायब हो चुकी थी। इस चमत्कार पर रेखा ने खुश होकर तालियां बजाई।

"अमर गंबा बैठे ना अपनी घडी? " मौसी ने हंसकर कहा।

"नहीं मौसी-ऐसा कुछ नहीं है । " इन्द्र भी हसा और फिर रेखा से कहा--"रेखा तुम जरा इस खाली प्लेट को औधा कथ दो । " रेखा ने खाली प्लेट आँधी कर दी-- "यह लीजिए I "

"अब सीधा कर दो । "

रेखा ने प्लेट सीधी की तो हैरत से उसकी चीख निकल गई ।

अमर की घडी सामने मौजूद थी । रेखा ने घडी उठाकर मुस्कराते हुए अमर की तरफ बढा दी--"देख ले, ठीक-ठाक तो है?"

"बिल्कुल ठीक है । " अमर घडी को उलट पुलटकर देखते बोला।

"इन्द्र ! बेटे मुझे भी बताओ कि तुमने क्या मंत्र पड़ा था मौसी बोल उठी ।

इन्द्र बडी सजीदगी' से वोला---"मौसी जादू वास्तव में शैतानी अमल है इसे सीखने के लिए जो मत्र' पढने पड़ते है उनका सम्बन्ध शैतान की जात से होता है। नेकदिल बदों को तो इनसे दूर ही रहना चाहिये। मैंने जो दिखाया है वह कोई मंत्र शक्ति नहीं, बल्कि यह ऐसा चमत्कार है जिनसे किसी को नुकसान नही पहुचता। " बहस सजीदा न हो जाए और सब, खास तोर पर अमर, कुछ उल्टा-सोधा न सोचने लगे-इन्द्रजीत ने ऐसे ही दो तीन नजरबंदी के करिशमे और दिखाए I और यूं रात गये तक वे सब गपशप में मस्त रहे और फिर अत्तत: लगभग बारह बजे सबने अपने-अपने कमरों का रूख किया। रेखा कुछ देर अपने भाई के कमरे में रूकी । उनका प्रोग्राम उस तावीज वाले काले कमरे में जाने का था।। रेखा ने भाई सै वक्त तय किया और फिर ऊपर अपने कमरे में आ गई । उन्होने- दो बजे के बाद नीचे जाने का प्रोग्राम बनाया था । नींद से बचने के लिए उसने बी० सी० आर० में एक पुरानी फिल्म की कैसेट लगाई व फिर रजाई में बैठकर आराम से फिल्म देखने लगी ।

दो घन्टे यूं आसानी से बीत गए। दो बजते ही उसने वी० सी० आर० बद किया । कम्बल परे फेंका और काली चादर ओढ ली।

बाहर बहुत तेज हवा चल रही थी । उसने चादर अच्छी तरह ओढ ली थी । हवा बहुत ठडी थी । चेहरे पर ब्लेड की तरह लग रही थी । चाद पूरी तरह रोशन था । इन्द्रजीत वाले कमरे की लाईट जल रही थी । खिडकी पर हालाकि पर्दा पड़ा हुआ था फिर भी रोशनी महसूस हो रही थी । तयशुदा सिगनल के तोर पर रेखा ने तीन बार खिडकी. का शीशा बजाया और कुछ क्षणों बाद इन्द्र दरवाजा खोलकर धीरे-से बाहर आ गया और धीरे-से बोला

"सब ठीक है। "

"हां-अभी तक तो ठीक है I " रेखा ने भी धीरे से जबाब दिया- "आ जाइये, मेरे साथ I"

गंगा मौसी के कमरे की लाईट जली हुई थी I उनके कमरे के आगे से हौते हुए वे दवे पाव चलते हुए बगले' के उस 'रहस्यमय कमरे' के सामने पहुचे और रेखा ने इन्द्र को रूक जाने का इशारा किया । कमरे के दरवाजे के हैण्डल पर काले धागे से बंधा ताबीज' पूर्ववत: ही लटका हुआ था।

इन्द्रजीत्त ने दरवाजे को बडे ध्यान से देखा । ताबीज पर भी नजर डाली। रेखा ने इस कमरे से सम्बधित जो कहानी सुनाई थी-उसके अनुसार यह कमरा उस प्रेत लोक या मायावी लोक में जाने का जरिया था, पर इससे भी कोई इन्सान उस 'स्वप्नलोक' तक तभी जा सकता था जब वहां का कोई गैर-इन्सानबास्री उसकी मदद करे ।

इस काले कमरे के रहस्यमय दरवाजे को देख़कर क्षणभर के लिए इन्द्रजीत्त के बदन में सनसनी फैल गई l खुद रेखा के हवास भी काबू में नहीं रहे थे। उसके दिल की धडकन अनायास तेज हो गई थी और हाथ-पांव बेजान सै होने लगे थे । पूरा वजूद ही कंम्पन का शिकार था ।

रेखा ने फौरन खुद को सम्भाला। साहस बटोरा और हाथ बढाकर दरवाजे के हैण्डल पर रख दिया I हैण्डल पर दवाब डालते हुए दरवाजे को हल्का सा धक्का दिया ।।

"अरे ! " रेखा के मुह से निक्ला ।

" क्यो क्या हुआ? " इन्दजीत ने आगे आ धीरे से पूछा।

"आप जरा दरवाजा खोलें।" रेखा दरवाजे के आगे से हटते हुए बोली।

इन्द्रजीत ने आगे बढ़कर हैण्डल पर हाथ रखा ओर उसे दवाकर दरवाजा खोलना चाहा, लेकिन दरवाजा नहीं खुला । दरवाजा लाॅक्ड था, कैसे खुलता?

"दरवाजा लाॅक्ड है। " कहता हुआ इन्द्र पीछे हट गया । उसके पीछे हटते ही रेखा ने एक बार फिर दरवाजा खोलने की कोशिश की पर दरवाजा लाॅक न होता तभी ना ।

"बेकार है ।" वह हताश सी बौली-"आ जाइये। "

इन्द्रजीत खामोशी से उसके पीछे हो तिया ओर फिर अपने कमरे के दरवाजे पर पहुंचकर वह रेखा से बोला --"अच्छा, रेखा I. तुम अपने कमरे मे जाओ। अब कल बात करेंगे। "

रेखा चितिंत सी अपने कमरे मे आ गई ओर सोचने लगी कि आखिर यह क्या हुआ? वह दरवाजा लाॅक्ड केसे हो गया? किसने किया?

जाहिर हे कि यह काम अमर या गगा' मौसी तो का नहीं सकते थे। खास तौर पर अमर को तो इस कमरे की 'ताजा कहानी' मालूम ही नहीं थी । उसे यह मालूम नहीं था कि दरवाजा खुला है या 'लॉक्ड' । उसने तो आजतक उस दरवाजे क्रो हाथ तक नहीँ लगाया था । गंगा' मौसी जरूर इस कमरे के वारे में थोडा, बहुत जानती थी-पर उन्हें भी कमरे को ताला लगाने की क्या जरूरत थी?

इससे पहले रेखा कई बार इस कमरे में जा चुकी थी l उसे इस दरवाजे का ताला हमेशा खुला मिला था । पिछली रात भी वह 'मायावी लोक' से इसी कमरे मे पहुची थी ओर दरवाजा खोलकर बाहर आई थी।

फिर यह अचानक क्या हुआ?
 
वह देर तक इस बारे में ही सोचती रही, पर कुछ समझ में नहीं आया। अत्तत्त': उसे सोचते-सोचते ही नींद आ गई ओर फिर... । उसे रात्त को स्वप्न में दादा हरिओम दिखाई दिये। वह रेखा के कमरे में आकर एक कुर्सी पर इत्मीनान से बैठ गए और रेखा को प्यार से देखते हुए बोले--

"हा', रेखा! क्या वात्त है क्यों परेशान हो?"

"दादा, उस कमरे का दरवाजा लाॅक कैसे हो गया?” रेखा ने अपनी परेशानी सुना दी । दादा हरिओम मद-मद मुस्कराते व फिर हौले सै बोले "वह हमने लाॅक किया है।"

"ओह । लेकिन क्यो? मैं भैय्या को दिखाना चाहती थी। " रेखा बोली।

"रेखा तुम्हें तुम्हारा भाई मिल गया-क्या तुम खुश नहीं हो?"

"मैं बहुत खुश हूं। "

"फिर अब तुम उस कमरे को भूल जाओ ओर जो कुछ बीता है उसे भी स्वप्न समझकर भूल जाओ। किसी भी बात की ज्यादा कुरेद अच्छी नहीँ होती । तुम मेरी बात समझ गई ना । " दादा हरिओम ने समझाने वाले लहजे में कहा। उनके लहजे में एक तरह की चेतावनी भी थी ।

"जी दादा। " रेखा धीरे से बोली "अच्छी तरह समझ गई हू। "

"बस तो फिर बिदा। " यह कहकर दादा कुर्सी सै उठे और उठत्ते ही अदृश्य हो गए । रेखा की आखें फौरन खुल गई।

अब उसे अन्दाजा हुआ कि वह ख्वाब देख रही थी। इस ख्वाब ने उसकी मानसिक उलझन दुर कर दी थी। उस कमरे को 'लाॅक' करने वाले दादा हरिओम थे ओर यही दादा हरिओम ही तो थे जिन्होंने रेखा को इस कमरे की राह दिखाईं थी ओर यह रास्ता उसे इन्द्रजीत तक ले गया था। जिसने राह खोली थी आज वही उसे वद कर गया था।

रेखा निश्चिन्त होकर फिर सो गई।

इन्द्रजीत जिन रास्तों पर जाना चाहता था, उसके लिए बंग्लोर लोट जाना जरूरी था । वह दिल्ली जाने के लिए बेचैन था । गगा मौसी के आपनत्त्वपूर्ण आग्रह पर ही वह दो चार दिन रूका । फिर दिल्ली जाने का फैसला कर लिया। रेखा को भी उसने साथ ले लिया ।

रेखा की खवाहिश पूरी हो गई थी। वह जब दिल्ली जाने के लिए तैयार हो गई तो गंगा मौसी ने गले लगाते हुए कहा--"रेखा तुम्हारा कमरा मैं बद करवा दूंगी यह तुम्हारे लिए ही है । जब तुम्हारा दिल चाहे लोट आना ।"

“जरूर मोसी । हालात जरा किसी करबट बैठ जाए । फिर भगवान नै चाहा तो में आपको ही यहा से ले जाऊगी । " रेखा ने अपने दिल की कही थी ।

"वाह! और मुझ गरीब का क्या होगा?" अमर चहका।

"तुम्हें अमीर बनाया जाएगा।" इन्द्र बोल उठा ।

"वह किस तरह? क्या किसी जादू के जोर से?"

"नहीँ ! बल्कि तुम्हारी शादी करके।"

"हे प्रभु! मेरे सिर पर हाथ रख । ये लोग तो मुझें बर्बाद करने पर तुले हैँ । " अमर ने कुछ ऐसे अदाज में कहा कि मौसी व रेखा के साथ ही इन्द्र भी हंस दिया था ।

गंगा मौसी और अमर उन्हें एयरपोर्ट छोडने आए। दिल्ली के एयरपोर्ट पर अंकल बलदेव उनके प्रतीक्षक थे I इन्द्रजीत्त ने फोन पर अंकल को सूचना दे दी थी। यूं वे बलदेव अक्ल के साथ सीधे अपनी माडल टाऊन बाली कोठी में पहुचे । फिर अगले ही दिन अंकल बलदेव के आग्रह पर इन्द्रजीत अपने पापा के रेस्तरां में पहुचा । रेस्तरां अब उसे ही सम्भालना था । उसने वहां का चार्ज सम्भाला और फिर अपने रेस्तरां में काम करने वालों में एक बन्दे को चुना और उसे सुबह कोठी पहुचने को कह दिया ।

रजीत एक मजबूत कद काठी का नौजवान था। वह रेस्तरां में बिल क्लर्क कीं हैसियत से काम करता था । दूसरे जरूरी कामों से फुर्सत पाने के बाद इन्द्रजीत उसी रात अपने चाचा रमाकांत के नाम एक पत्र लिख डाला उसने लिखा

"आपने मेरे और पापा के साथ जो कुछ किया है वह आप जानते ही है । प्रभु कृपा से मैं अपने घर वापिस आ गया हूं। मेरे साथ मेरी बहन रेखा भी है। आप शराफत से मेरे पापा की जमीनें-बाग व साबनपुर की हवेली का आधा हिस्सा दस दिन के भीत्तर खाली कर दें । मैं ग्यारहवें दिन साबनपुर आऊगा। जमीनों की आमदनी का अब तक का हिसाब किताब तैयार रखियेगा I मैं अब आपसे एक-एक पैसै का हिसाब लूगा ।"

आपका इन्द्रजीत ।

इस खत को उसने एक लिफाफे में वद' किया उर उस पर अपने चाचा का नाम व पता लिख दिया । सुबह रजीत्त' जब कोठी पहुचा तो उसने लिफाफा उसके हवाले करते हुए उसे समझा दिया उसने यह पत्र कहा व किसे पहुचाना है ।

रजीत के सावनपुर रवाना होने के बाद इन्द्रजीत ने रेस्तरां का रूख किया और फिर रात्त तक रेस्तरां में ही रहा । रेस्तरां का मैनेजर बहुत ही मेहनती आदमी था । उसने रेस्तरां को बडी. कुशलता से सम्भाला हुआ था । काम के हिसाब से उसकी त्तनख्वाह कम थी । सो इस दिन इन्द्रजीत्त ने उसकी 'पै' में अच्छी खासी बढोतरी. करके उसे खुश कर दिया ।

इन्द्रजीत के पापा एक कला-प्रेमी व्यक्ति थे और उन्होंने बकायदा एक आर्ट-गेलरी खोली हुई थी ।

इन्द्रजीत ने अगली सुबह आर्ट गैलरी में जाने का प्रोग्राम वनाया । आर्ट-गैलरी में ताला पडा, हुआ था । इन्द्रजीत्त ने आर्ट-गैलरी रेखा के सुपूर्द करने का फैसला किया था कि यू बह घर में अकेली रहकर बोर होने से बच जाएगी। इन्द्रजीत अभी सोकर भी नहीं उठा था कि एक नौकर ने जोर-जोर से उसके कमरे का दरवाजा बजाया। इन्द्रजीत ने दरवाजा खोला तो घर का यह नया नोकर परेशान खडा. था । उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं ।

..

" क्या हुआ ?" इंद्र ने पूछा ।

"साहब जी-गेट पर एक लाश पडी है।। ”

"लाश.... लाश? "

"वो जो कल जो साहब यहा आए थे। उनकी लाश है जी।"

"रंजीत की लाश ?" इन्द्रजीत ने जैसे खुद सै सवाल किया यह केसे हो सकता हैं?"

जो नही होना चाहिये था-वह हो गया था।

इन्दजीत्त कों आशा नहीं थीं कि ऐसा हो जाएगा । उसका तो ख्याल था कि जव रजीत रमाकांत को उसका पत्र देगा तो रमाकांत पत्र पढकर कापने लगेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ था रमांत्कात ने खुद कापने की बजाय इन्द्रजीत को कंपा दिया था । उसने पत्र ले जाने वाले को मारकर उसके घर के दरवाजे पर फेंक दिया था। इससे ज्यादा दीदा दिलेरी और क्या हो सकती थी?

इन्द्र अपने नौकर रानू के साथ गेट पर आया।

रजीत्त की लाश गेट के बराबर दीवार के साथ पडी थी । इन्द्रजीत ने करीव से उसका जायजा लिया l रजीत के बटन पर कहीं कोई चोट का निशान या धाब नजर नहीं आया। इन्द्र ने उसकी नब्ज देखी। नब्ज चल रही थी और दिल भी धडक रहा था। रजीत अभी जिन्दा है।

इन्द्रजीत ने अपनी माडी निकाली I रेखा को सूरतेहाल सै आगाह किया व फिर रजीत को गाडी में डालकर फोरन एक अच्छे अस्पताल का रुख किया ।

डाक्टरो की एक दो घन्टे की मेहनत के बाद रजीत को होश आ गया। अगले दो घन्टो मे उसकी हालत बिल्कुल ठीक हो गई और फिर और एक घटा रखकर उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

डाक्टरों की रिपोर्ट के अनुसार, रजीत को कोई शारीरिक चोट नहीं पहुंचाई गई थी, बल्कि उसे एक नशीली दबा का तेज इजेंक्शन लगाकर छोड दिया गया था । अगर रजीत को तुरन्त डॉक्टरी मदद न मिलती तो-डाक्टरों कीं राय के अनुसार-बो अपनी इस बेहोशी में मर भी सकता था ।।

इन्द्रजीत्त ने भगबान का शुक अदा किया। रजीत मर जाता तो बहुत बडा अनर्थ हो जाना था। रंजीत्त की जेब से एक कागज बरामद हुआ जिस पर लाल रग की स्याही से लिखा था।

"ग्यारहवां दिन अभी बहुत दुर है। हमारी तरफ से पहले दिन का तोहफा कबूल करो। "

रमाकांत ने इन्द्रजीत की ग्यारहवें दिन कीं धमकी का वडी खूंवसूरती से मजाक उडाया था ।रात्त को अपनी गाडी भेजकर इन्द्रजीत्त ने रंजीत को अपनी कोठी पर बुलवा लिया और बलदेव अकल की मौजूदगी में रजीत ने अपनी सावनपुर की रिपोर्ट दी । उसने सावनपुर का हाल बयान करते हुए कहा--

"मैं सावनपुर की हवेली पर पहुचा में मैंने रमाकात से मिलने की ख्वाहिश जाहिर की । मुझें फोरन हवेली के अन्दर पहुचा दिया गया । कुछ देर बाद हवेली के आलीशान ड्राईरूम में रमाकांत तशरीफ लाए I बूढे. होते हुए भी वह मुझें खास चाक चौबन्द नजर आए। उन्हौंने अपनी सुर्ख खूंखार आखो से मुझें घूरा और आने की वजह पूछी । मैने आपका पत्र जेब से निकालकर उनकी तरफ बढा दिया । इस बीच एक नौजवान शख्स. जो शायद उनका बेटा था, खामोशी से आकर वहा बैठ गया था।

"' . . मुझसे लिफाफा लेकर रमाकांत ने अपने बेटे की तरफ बढा दिया l उसी ने पत्र निकालकर पढा और उसके चेहरे की रंगत बदल गई। उसने रमाकांत से कहा "आओं, पापा ।" बेटे के साथ रमाकांत हवेली के अदर चला गया । मैं ड्राइरूम में अकेला रह गया ।

कुछ देर बाद उनका बेटा दोबारा ड्राइगरूम में आया और मुझसे बोला "ठीक है तुम जाओ । " उसकी यह बात सुनकर मैं खामोशी से उठा और हवेली से बाहर निकल आया । मेंने मेन राड पर आकर वापसी के लिए बस पकडी और रात आठ बजे अपने घर पहुच गया । खाना खाकर मेने' सोचा कि यहां आकर आपको सूरत्तहाल से आगाह कर दूं। "

" पर घर से निक्लकर गली में आया तो अंधेरे में खडी कार से अचानक तीन-चार बन्दे बाहर निकले और मुझें जबरन गाडी में डालकर आगे बढ गए। मेरी आखों पर काली पट्टी बाध दी गई और रिवाल्वर की नाल पह्रलू में चुभोकर खामोश बैठे रहने की धमकी दी गई । एक लम्बे सफर के बाद मुझे गाडी से उतारा गया। किसी ने मेरा हाथ पकड़कर मुझे रास्ता दिखाया। मैं नहीं जानता मुझें कहा ले जाया गया। जहां ले जाया गता वहा मुझें धक्का देकर गिरा दिया गया । मैं एक बिस्तर पर गिरा था । फिर मेरा कोट उतारकर, कमीज की आस्तीन चढाई. गई और अभी में अदाजा नहीं लगा पाया था कि उनका इरादा क्या है कि मेरे बाजू में एक इंजेक्शन झोंक दिया गया । टवा अन्दर जाते ही मुझें चक्कर आने शुरू हो गये और कुछ ही लम्हो बाद में अपने होश गवा बैठा । फिर जब मेरी आख खुली तो मैं अस्पताल में था । "

"रंजीत तुम खौफजदा तो नहीँ हो? " पूरी कहानी सुनने के बाद इन्द्रजीत ने कहा ।
 
"अरे नहीं सर ।। खौफजदा होने की भला क्या बात्त है? बैसे मेरी समझ में एक बात नहीं आई कि वे कौन लोग थै और उन्होने- ऐसा क्यो किया? जबकी मेरी किसी से दुश्मनी भी नहीं है, सर ।"

"असल में उनका मकसद तुम्हें खौफजदा करना नहीं था,बल्कि तुम्हारे जरिये मुझे खौफजदा करना था । वो कोन थे, मैं अच्छी तरह जानता हूं। उनकी दुश्मनी तुम्हारे साथ नहीं, मेरे साथ है । बहरहाल, तुम बेफिक्र हो जाओ । अगर चाहो तो एक दो दिन घर पर रहो और आराम करोl जव तवियत विल्कुल ठीक हो जाए तो फिर रेस्तरां! आ जाना। " इन्द्रजीत ने हमदर्दी से कहा।

"नहीँ सर-में विल्कुल ठीक हूं। आप मेरी फिक्र न करे । मैं कल अपनी ड्यूटी पर आऊगा । "

"ठीक है, फिर तुम जाओ । " इन्द्र वोला । साथ ही उसने नोकर रामू को पुकारा और उसे हिदायत दी "ड्राइवर से कहो कि यह रजीत साहब को उनके घर छोड़ आए। "

"सर, मै चला जाऊँगा I इस जहमत की जरूरत नहीं । "

"नहीं ड्राइवर तुम्हें छोड आएगा। " "जैसी आपकी मजी, सर । "

"ओ० के० । " इन्द्रजीत ने खडे होकर उसके साथ हाथ मिलाया और फिर उसके जाने के बाद, इन्द्र अब तक खामोश तमाशाई बने वैठे अंकल बलदेव से सम्बोधित हुआ "जी, अकल! अब आप क्या कहते है, इस मामले के बारे में? "

"रमाकांत ने बडा शातिराना अदाज में वार किया हे। "

"उसके खिलाफ नामजद एफ आई आर करवा दू'?" इन्द्र ने सलाह मागी ।

"किस जुर्म की?"

"मेरे मुलाजिम रजीत्त' को किडनैप करवाने की । "

"पर तुम्हारे पास इस बात का क्या सबूत है कि उसने यह काम किया है। भई, यह सीधा-सादा एक ड्रग्स के आदी नौजवान का केस है-जौ जरूरत से ज्यादा मात्रा में कोई नशा लेकर बेहोश हो गया । रमाकांत अगर उसको अगुवा ही करवाता तो फिर अपने इलाके से करवाता। उसे मारना होता तो बकायदा हमला करवाता । ऐसा कुछ भी नहीं, हुआ I इन्द्र, मैं तो कहता हू कि भगवान् न करे रजीत अगर मर भी जाता तब भी हम रमाकांत का कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे । "

"और वह तहरीर जो उसकी जेब से बरामद हुई है?"

"ऐसी तहरीर कोई भी लिख सकता है। कहा जा सकता है कि वह तहरीर भी तुमने खुद ही लिखी अपने दुश्मन चाचा क्रो फंसाने के लिए।"

"हू'। " इन्द्र खामोश हो गया । हकीकत समझ गया था वह ।।

"इन्द्र ! " अकल बलदेव बोले "रमाकांत लोमडी की तरह चालाक और भेडियै, की तरह खूंखार' शख्स है । "

”तो फिर मैं शेर बन जाता हूं। एक ही वार में उधेडकर फेंक देता हूं। " इन्द्रजीत को तैश आ गया ।

तभी रेखा ने अन्दर झांका व सिर्फ अकल व भाई को देखकर अंदर आ गई।

उसने भीतर आते हुए इन्द्र का कहा सुन लिया था ।

उसने घबराकर पूछा

"क्या हुआ । यह तैश केसा?"

"आओ, बेटी I " अंकल बौले--"तुम ही जरा अपने भाई को समझाओ। यह मरने-मारने पर तुला हुआ है I. "

"रेखा तुम जानती हो कि रजीत के साथ जो क्या हुआ किसने किया?"

रेखा शात भाव से बोली-- "मै अन्दाजा लगा सकती हू कि वह सब अपने चाचा का किया धरा है । " उसने बलदेव अकल की तरफ देखा, पूछा--वयो अकल, क्या आप मुझसे सहमत नहीं हैं?"

"शत-प्रति शत सहमत हूं।" बलदेव राज ने गहरा सास लेकर कहा--"पर बच्चों, एक बात समझ लो कि तुम मेरे लिए वहुत कीमती हो । इन्द्र तुम अपनी बहन के लिए अनमोल हो । अपने खौफ व अपने प्यार कीं वजह से कृष्णकांत ने उसे मजबूरन अपने से दूर रखा । यूं रेखा को ध मां की ममता मिली न बाप का प्यार-दुलार । अब क्या तुम उससे भाई का प्यार और उसकी सुरक्षा भी छीन लेना चाहते हो?"

" भगवान् न करे । " इन्द्रजीत्त कीं प्यार भरी नजरे अपनी वहन क्री तरफ उठ गई ।

"तो फिर शेर बनकर अपने चाचा रमाकांत को उधेडने_ की रव्वाहिश अपने दिल सै निकाल दो l मैं तुम्हें जगल में नहीं जाने दूंगा । जगल का कानून नहीं अपनाने दूंगाl रमाकांत की मौत सै हमारा केस और भी पेचीदा हो जाएगा। "

"पर मेरा क्लेजा तो ठण्डा हो जाएगा I उसने मेरे पापा को मारा हे । इंतकाम लेने का हक है मुझे । " इन्द्रजीत्त अपने रोष को दबा नहीं पा रहा था ।

"कातिल बनना चाहते हो । " बलदेव राज ने सवाल किया और फिर इससे पहले कि इन्द्रजीत्त कोई जवाब देता, वह रेखा से सम्बोधित हुए, उससे पूछा--" क्यों रेखा, क्या तुम चाहोगी कि तुम्हारा भाई कातिल बन जाए? "

"नहीँ, अकल'! भूलकर भी नहीं I " रेखा तेजी से बोली--"मैं अपने भाई को खोना नहीं चाहती I "

"सुन लिया, इन्द्र । देखौ, बेटे तुम्हारे आ जाने सै हमारा दावा और हमारा केस अव वहुत मजबूत हो गया है । अब हम नये सिरे से रमाकात पर मुकद्दमा करेंगे और आखिर उसे हमारी जमीनें, हमारी जायदाद हमारे हवाले करनी होंगी I रही बात इतकाम की तो तुम यह क्यो भूल जाते हो कि भगबान सबसे बडा न्याय करने वाला है । उस पर क्यों नहीं छोड देत्ते इस इत्तकाम की चाह को? वही लेगा हमारा इतकाम और मेरा बिश्वास है कि इस तरह लेगा कि दुनिया देखेगी । रमाकांत का अजाम दुनिया भुला नहीँ पाएगीl"

!पता नहीं बलदेव अकल के इन शब्दों में क्या असर था कि इन्द्रजीत्त के दिल को करार सा आ गया । वक्ती तौर पर उसके दिल में भडकते_ इतकाम के शोले सर्द पड गए। रेखा भी कुछ निश्चित सी दिखने लगी थी । हालाकि वह खुद अपने जालिम चाचा के प्रति अपने दिल में प्रतिशोध की प्रचण्ड भावना रखती थी, पर अब समझ में आ रहा था कि हालात जज्बात से काम लेने की इजाजत नहीँ दे रहे ।

रेखा ने अकल के दिशा निर्देश सै सहमति जताई और तय हुआ कि जमीन जायदाद की वापसी के लिए नया मुकदमा दायर किया जाएगा और कानून को अपने हाथ में लेने की कतई कोई कोशिश नहीं की जाएगी।

इन्द्रजीत्त खामोश बैठा सव सुनता रहा था बोला कुछ नहीं। उसने फैसले को कबूल कर लिया था या फिर उसने अपने दिल में कोई और फैसला कर लिया था । कोई नहीं जानता था I

बहरहाल, बलदेव अकल के सुझाव पर चलते हुए जायदाद कीं सुपुर्दगी के लिए वकील के जरिये लीगल नोटिस भिजवा दिया गया । कानूनी कारवाईं आरम्भ हो गई और इस कानूनी कार्रवाई क्री निगरानी की जिम्मेदारी स्वयं बलदेव अकल' ने अपने जिम्मे ले ली।

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इंद्रजीत ने रेस्तराँ का कार्यभार सम्भालने के बाद 'आर्ट गेलरी' की तरफ ध्यान दिया । गैलली का नये सिरे से रिनोवेशन कराया गया । अभी तक यह 'आर्ट गेलरी' उसके पिता कृष्णकांत का शोक था I यहां पर बड़े-बड़े ऊंचे पैमानो पर विख्यात आर्टिस्टो की कलाकृतियों का प्रदर्शन होता था । इन प्रदर्शनियों में आने वाले भी कला-पारखी व ऊँची सोसाइटी कै गणमान्य आमंत्रित होते थे I

लेकिन इंद्रजीत ने 'आर्ट गैलरी' क्रो आम करने की ठानी I उसने गैलरी को पब्लिक के लिए खोल दिया ।

उसने गैलरी को सुचारू रूप से व्यवस्थित करने के बाद गेलरी रेखा के स्पूर्द कर दी गई I रेखा का आर्ट से फितरी लगाव था I उसका खुद का हाथ बहुत अच्छा था ।

वह एक प्रसिद्ध महिला आर्टिस्ट की शिष्या बन गई और बहुत तेजी से आर्ट की प्रारम्भिक सीख व समझ ली' । अब वह अपनी आर्ट गेलरी के दफ्तर में बैठी पेन्टिग बनाने में व्यस्त रहती I

एक दिन रेखा अपने काम में मस्त थी कि टेलीफोन की घटी बजी।

"हैलो । " रेखा' रिसीवर उठाकर बोली।

"देखिए, मूझे 'आर्ट गेलरी' के मालिक से बात करनी है॥"उधर से किसी महिला की गरिमापूर्ण आवाज सुनाई दी ।

"जी फामाइये । " रेखा ने कहा ।

"क्या आप इस आर्ट गेलरी की मालिक हैं?" उधर सै पूछा गया।

"मुझे दरअसल मालिक कहलवाना पसन्द नहीं है आप मुझे इस 'आर्ट गैलरी' की मैनेजर कह सकती हैं। " रेखा ने जबाब दिया-"मेरा नाम रेखा है।"

"देखिए रेखा जी । में दरअसल दिल्ली में नहीं रहती । मुझे किसी ने इस आर्ट गैलरी के बारे में बताया था । सोचा, बात कर लू। "

"जी फरमाडये । " रेखा शालीनता के साथ बोली।

"मेरे पास कुछ 'पेन्टिग्स' है मैं उनकी प्रदर्शनी के बारे में आपसे बात करना चाहती थी। "

"वेलकम । " रेखा बोली-"तशरीफ लाईए।”

"कल किस वक्त हाजिर हो जाऊ'। "

"जब जी चाहे I ऐनी टाइम । मैं दिन भर यहीँ होती हूं।" रेखा ने निमत्रण' दिया ।

"फिर भी?"

"सुबह ही आ जाएं-ग्यारह बजे तक । " रेखा ने टाइम दिया I

"जी ठीक है थैक यू बैरी मच ।" उधर से कहा गया व सम्बन्थ विच्छेद हो गये।

सम्बन्ध विच्छेद हो गए तो रेखा क्रो ख्याल आया कि उसने फोन करने वाली का नाम तो पूछा ही नहीं और न ही यह पूछा कि वह बोल कहा' से रही है?

”चलो, खैर । कल आएगी ही तव पूछ लेगी I " यह सोचकर उसने ब्रुश सम्भाला व 'कैनवेस' पर रग लगाना शुरू कर दिया । शाम को रेखा जब घर पहुची' तो इन्द्रजीत चाय की मेज पर उसका प्रतीक्षक था।

रेखा मुह'-हाथ धोकर चाय की मेज पर आ गई I

"हां, तो आर्टिस्ट साहिबा। कितनी तस्वीरें बनाई आज । " इन्द्र ने मुस्कराते हुए पूंछा।

"तस्वीरें ।" रेखा चकित-सी बोली--"मजाक क्यों कर रहे है, भैय्या मुझें तो एक पेटिंग पर ही काम करते हुए पन्द्रह दिन हो गए है । "

”औह्र! ऐसी सुस्त रफ्तार से काम होगा फिर तो पाच साल बाद ही पैन्टिग्स' की नुमाईश हो सकेगी।"

"खैर ये, नुमाईश की कोई जल्दी भी नहीं है। " रेखा ने मुस्कराते हुए कहा और कपों में चाय उडेलने लगी ।

"कोई हगामा करो भई! तुम्हारी आर्ट गैलरी बडी ठण्डी जा रही है ।"

रेखा को उस फोन काल का ख्याल आया, वह बोली भैय्या आज किसी महिला का फोन आया था, वह अपनी 'पेन्टिंग्स-' की नुमाईश चाहती है । "

"अगर पेन्टिंग्स अच्छी है तो फिर देर न करो । " इन्द्र ने सुझाव दिया।।

"तस्वीरों का तो कल पता चलेगा। वह कल ग्यारह बजे आएगी। " वे दोनों अभी इस वावत्त बातें ही कर रहे थे कि बाहर से गोलियों के धमाकों की आवाज आई।

"भैय्या, फायरिंग ।" रेखा ने सहमकर कहा ।
 
तभी ड्राइगरूम के शीशों के टूटने कीं आवाजें आई I इन्द्र जल्दी से बोला "रेखा नीचे बैठ जाओ । ये गोलियां हमारे घर पर चल रही हैं । "

उन दौनों ने कुर्सियां छोड नीचे बैठने मे देर नहीं लगाई थी। यह खेल मुश्किल सै एक-दो मिनट का था । फायरिंग करने वाली गाडी गोलियां बरसाकर जा चुकी थी । यह इल्मीनान हो जाने पर कि फायरिंग करने वाले जा चुके हे-तौ दोनों बहन भाई गेट पर पहुचे। गैट पर भी निशानेबाजी की गई थी । गेट गोलियों से छलनी था । गेट के साथ वाली दीदार पर भी गोलियों के निशान थे । कोठी के डाइगरूम पर भी अच्छी खासी गोलीबारी की गई थी । खिडकियों. के शीशे टूट चुके थे ।

पास पडोस. के लोग भी वाहर निकल आए थै। किसी ने भी फायरिंग करने बालों को नहीं देखा था । नोकर रामू सयोग से साग-सब्जी लेने घर से बाहर गया हुआ था और जब वह वापिस आ रहा था तो उसने एक सफेद गाडी को खडे हुए देखा और उस गाड़ी से फायरिंग करने वालों को देखा था । वे सख्या मे तीन थे। उनके चेहरे कपडे से ढके हुए थे । फायरिंग दो व्यक्तियों ने एक साथ क्री थी । एक ने गेट को निशाना बनाया था-और दूसरे ने बैठक की खिडकी. को और फिर गाडी को तेजी से भगाते हुए गली में मुड गए थे ।

गेट बद करवाकर इन्द्रजीत्त वापिस चाय की मेज पर आ गया उसने रेखा को बैठने का इशारा करते हुए कहा--

"कमवख्तो ने चाय का मजा भी किरकिरा कर दिया । "

"इस फायरिंग का क्या मक्सद हो सकता है, भैय्या?" रेखा ने चिन्तित स्वर मे पूछा ।

"हमें खोफजदा करना । " इन्द्र बेपरवाही से बोला- "अपने चाचा के हौसले बढते जा रहे है। "

"भैय्या। वे लोग कोठी के भीतर भी आ सकते थे।" रेखा ने अदेशा व्यक्त किया--"और तव कोई जानी नुकसान भी पहुचा सकते थे। हमें सिक्योरिटी गार्डस का इंतजाम करना चाहिये । "रेखा अभी भी सहमी हुई थी ।

इन्द्रजीत ने इत्मीनान सै चाय पी।।

फिर लॉन में रखै फोन की तरफ बढ गया ।उसने कोठी पर होने वाली फायरिंग की खबर बलदेव अंकल को दी । बलदेव अक्ल ने पूरी बात सुनने कीं कोशिश ही नहीं की । उन्होंने कहा--"मै आ रहा हूं।" और यह कह्रकर उन्होंने सम्बन्ध विच्छेद कर लिए थे ।

बलदेव राज आया और उसने कोठी का निरीक्षण किंया-दोनों की खैरियत पूछी-सब कुछ सविस्तार सुना,फिर बोले-- "चलो, पुलिस स्टेशन चलते हैं। इस वारदात की रिपोर्ट जरूरी है।"

थाने मे रिपोर्ट दर्ज कर दी गई । फायरिंग के सिलसिले मे रमाकांत पर शक जाहिर किया गया । पुलिस क्रो बताया गया कि रमाकांत के अलावा उनका कोई दुश्मन नहीँ । पिछले एस० एच० ओ० का ट्रासफर हो चुका था । यह कोई नया इस्पेक्टर आया था । इसका नाम नरेश यादव था । उसे रमाकांत के बारे में कुछ मालूम नहीँ था । बलदेव राज ने उसे डिटेल में समझाया। यह भी बताया कि इस कोठी पर दो नौकरों का कत्ल भी हो चुका है ।

बलदेव राज ने अपनी बात खत्म करते हुए बताया--" उन नौकर मियाँ बीबी के कल्ल पर भी हमारा शक यही था कि उनका कत्ल रमाकांत के वन्दौ ने किया है, क्योकि वह देवगत कृष्णकांत कीं हत्या के बारे में बहुत कुछ जानते थे। "

पिछली वारदातों की तरह पुलिस ने इस फायरिंग के बारे में भी औपचारिक अंदाज में कार्रवाई की और फिर मामला ठडै बस्ते में चला गया । बलदेव राज और इन्द्रजीत्त दोनों ही जानते थे कि ऐसा ही होगा, लेकिन उन्होंने यह रिपोर्ट महज कानूनी कार्रवाई के तौर पर की थी। चल रहे मुकदमों में यह रिपोर्ट मदद का सकती थी ।

इन्द्रजीत्त ने दो सुरक्षा गार्ड रख लिए और उन्हें गेट की बजाय, कोठी में 'सर्वेन्ट क्वाटर्सं' के करीब तैनात किया ताकि किसी संम्भावित हमले पर प्रभावशाली कार्रवाई कर सके। यानि कि इन गार्डों क्रो कोठी में गुप्त रूप सै रहते हुए अपनी ड्यूटी अजाम देनी थी ।

अब इन्द्रजीत अपने पास भी हर वक्त भरा रिवाल्वर रखने लगा था। वह चाहता था कि अब रेखा घर से कम-से-कम ही निकाने. लेकिन वह आर्ट गेलरी छोडने… व घर में बद होने पर राजी नहीं थी। तव इन्द्रजीत ने उसके लिए भी एक सशस्त्र गार्ड का इंतजाम कर दिया बौ उसकी गाडी के पीछे पीछे मोटर साइक्लि पर चलता था । रेखा फायरिंग की उस वारदात से खौफजदा हुई भी, लेकिन इतनी भी नहीँ कि वह घर से निकलना ही छोड देती ।

वह तो अगले ही दिन अपने निश्चित वक्त पर आर्ट गैलरी पहुच गई थी । उसने उस महिला आर्टिस्ट को ग्यारह बजे का टाइम दिया था इस वक्त पौने ग्यारह बजे थे।

और जाने क्यो रेखा उस आर्टिस्ट से मिलने को बडी बैचेन थी ।

वह आई और ठीक ग्यारह बजे आई। ठीक ग्यारह बजे आर्ट गैलरी के दरवाजे पर गाड़ी के हार्न की आबाज आईं। चौकीदार ने गेट खोल दिया । गाडी अंदर आ गई । फिर कुछ ही देर में रेखा को राहदारी में खट-खट की आबाज सुनाई दी I यह आवाज ऊची ऐडी के जूतो कीं आवाज थी ।

रेखा अपनी टेबल के पीछे सम्भलकर बैठ गई।

वह महिला भीतर आई। वह सफेद साडी में इतनी 'ग्रेसफुल' लग रही थी कि रेखा पलके झपकाना भूल गई । उस महिला के' फोरन बाद ही सादा लिवास में एक स्टेनगनधारी शख्स अंदर आया-उसनै रेखा क्रो घूरकर देखा-फिर कमरे का जायजा लिया और उलटे कदमों वापिस चला गया।

”माफ कीजिएगा, आप ही शायद मिस रेखा है? " आगन्तिका ने झिझकते हुए पूछा।

"हां । " रेखा ने बस इतना ही कहा।

"आश्चर्य है।“ वह आगे बढते हुए बोली "आप तो बहुत कम उम्र हैँ । "

"आपका क्या ख्याल था कि आपको यहा' कोई पच्चास-साठ की औरत बैठी मिलेगी । " रेखा ने हसकर कहा।

"मेरा ख्याल था कि कोई कम-सै-कम मेरो हम उम्र मेनेजर होगी। " उस आकर्षक महिला ने अपना हाथ आगे बढाते, हुए कहा I

”कमाल है l " रेखा ने खड़े होकर उसका हाथ थाम लिया I उसका हाथ ब्रड़ा कोमल था और खूबसूरत भी । रेखा ने बडी गर्मजोशी से हाथ मिलाकर' उसे कुर्सी पर बैठने का इशारा किया… "तशरीफ रखें l "

"धन्यचाद । " उसने भीनी भीनी मुस्कान के साथ कहा ।

"कल आपका फोन आया था तो मुझें आपका नाम पूछने का ख्याल ही नहीं आया और आपने भी अपना नाम नहीं बताया था । "

"मेरा नाम बडा. पुराना सा है इसलिए बताने में सकोच करती हू।"

"लो यह क्या बात हुई-नाम सिर्फ नाम होता है पुराना या नया नहीं होता । अगर ऐसा होता तो लोग हर बीस साल बाद अपना नाम बदल लिया करते । हां, क्या नाम है आपका?"

''मेरा नाम पुष्पा है। "

"वाह्र, इतना प्यारा नाम तो है। " रेखा चहकी । फिर पूछा "आपका काम कहां है?"

"मेरी पैन्टिंग्स गाडी में हैं अभी आपके सामने आई जाती है। "

पुष्पा ने अभी जवाब ही दिया था कि दौ शख्स बड़े-बड़े फ्रेम उठाए अदर दाखिल हुए। ये कुल बीस कलाकृतियां थीं और पैक थी । इन पर भूरा कागज लिपटा हुआ था। ये तस्वीरे' शायद सीधे फ्रेम करने वाले की दुकान से लाई गई थीं।

रेखा क्री उत्सुकता जागी थी । वह वोली-" अगर अनुमति हो तो मै इनका घुघंट उठाकर देख सकती हूं ।"

"हां हां...क्यों नहीं, लेकिन इन तस्वीरो को देखने सै पहले यह बात जहन में रखिएगा कि मै कोई बकायदा पेन्टर नहीं हूं। ये सारी तस्वीरें मैंने बरसों में बनाई है । जव इतनी तस्वीरे एकत्रित हो गई तौ जी चाहा कि लोगों के सामने रखूं। "

"यह तौ आपने वहुत ठीक सोचा I ऐसे काम का क्या फायदा जो लोगों के सामने न आए ।।”

"एक बात मैं और आपसे कहना चाहती हूं। मैं अपना काम आर्ट के चाहने बालों के आगे पेश तो करना चाहती हूं लेकिन स्वयं सामने नहीँ आना चाहती। अगर आपने इन तस्वीरो क्रो प्रदर्शित करना स्वीकार कर लिया तो प्रदर्शनी में महज एक दर्शक की हैसियत से आऊगी और खामोशी सै लोगों की टिप्पणिया सुनना चाहूगी !!" यह कहते हुए उसने एक तस्वीर के ऊपर से कागज फाड़ दिया । और रेखा पहली ही तस्वीर देखकर दंग रह गई ।

और जब उसने एक एक करके सारी तस्वीरे देख ली तो वह जेसे गुगी ही हो गई । हर पेटिग देखने के बाद हैरानी से पुष्पा की तरफ देखती । ये पेन्टिग्स कला के तौर पर तो ज्यादा पुख्ता न थीं-लेकिन इन तस्बीरो में जो कुछ दिखाया क्या था वह बहुत पुख्ता था । इन तस्वीरों में आर्टिस्ट की निजी भावनाये बिखरी पडी थी ।

सारी तस्वीरे देखने के बाद रेखा ने वडे जोश से कहा--" मैं इन क्लाकृतिर्यो की प्रदर्शनी इस कदर धूमधाम से करूँगी कि पूरे देश में आपके चर्चे हो जाएगे । "

"मिस रेखा, मुझे प्रसिद्धि नहीं चाहिए । " पुष्पा धीमे से बोली ।

"हां, मुझे अदाजा है, इसलिए आपने इन तस्वीरो पर अपना नाम भी नहीँ लिखा । " रेखा ने अव सीधे पुष्पा की आखों में झांकते हुए कहा था---"एक बात पूछ, सच-सच बताएगी?"

"हां, पूछें मिस रेखा! मै झूठ क्यों बोलूगी?" वह ओड़ा-सा हैरान होकर बोली थी ।

"क्या आपका नाम वाकई पुष्पा है?" यह एक अजीब सबाल था ।

इस प्रश्न पर पुष्पा को एकदम करन्ट-सा लगा। उसने एक नजर रेखा को देखा और अपनी खूबसूरत आखो पर पलकों का शामियाना डाल लिया ।

"नहीं । " वह धीमे से बोली "यह मेरा असली नाम नहीं है । "

"हुरें... ! " रेखा जैसै खुशी से उछल पडी-"यह जानकर मुझे बहुत खुशी हुई कि यह आपका असली नाम नहीं है । "

"आपकी यह खुशी मेरे लिए आशचर्यजनक हैँ । इससे क्या फर्क पडता है कि मेरा नाम पुष्पा है या मेनका?"

"आप ठीक कह रही है । इससे सच ही में कोई फर्क नहीँ पडता है कि आपका नाम पुष्पा है या मेनका, लेकिन अगर नाम नयना हो तो फर्क पडता. है । बहुत फर्क पडता है । " रेखा अब उसे प्यार भरी निगाहों से देख रही थी और उसके होंठों पर शरीर स्री भेदपूर्ण मुस्कान थी।

रेखा के मुह से यह सुनकर उसकी आखें फैल गई । उसका नाम नयना ही था और रेखा ने तो उसे, उसकी पहली तस्वीर देखते ही पहचान लिया था कि वह राजकुमारी नयना के अलावा कोई और नहीं हो सकती।

उसकी पहली पेन्टिंग-में पेड ही पेड़ थे और इन्ही पेडों के बीच पत्थर पर एक मर्दाना कमीज पडी हुई थी। बड़ा ही रहस्यमय व खूंबसूस्त 'लेण्डस्केप’ था । एक दूसरी तस्वीर में एक लडका, और लडकी. घोडों, पर बैठे बातें करते जा रहै थे और 'बैकग्राउन्ड' में खेत फैले हुए थे। एक अन्य पेन्टिग में एक लडकी घोडे पर सवार थी और उसके चेहरे के भावो सै पता चलता था कि जेसे वह किसी को ढूंढ रही है । यानि कि जितनी भी तस्वीरे थीं वे सबकी-सब उस कहानी का हिस्सा थीं जो काले चिराग ने रेखा को सुनाई थीं और राजूमदारी नामक तांत्रिक के मत्रजाल से छूटकर राजकुमारी नयना व उसके भाई इन्द्रजीत की कहानी थी ।
 
अब इस बात में कोई सन्देह न रहा था कि यह आर्टिस्ट सुन्दरी और कोई नहीं उसके आई इन्द्रजीत की नयना थी। नयना ही अपनी व्यथा को कैनवेस पर उतार सकती थी ।

" अपना नाम सुनकर हैरान हो गई ना?" रेखा ने शोखी से कहा।

"मेरी समझ में कूछ नहीं आ रहा। ” वह परेशान सी बोली “रेखा, आपको मेरा नाम केसे मालूम हुआ?"

"सब समझ में आ जाएगा। मैने तय कर लिया है कि अब मुझे क्या करना है? मैं आपकी पेन्टिग्स' की प्रदर्शनी का उद्घाटन एक बहुत बडी. हस्ती से कराउगी । आप देखती जाएं कि में क्या करती हूं? उद्घाटन वाले दिन मैं आपको ऐसा सरप्राईज दूगी कि आप जिन्दगी भर याद रखेंगी।"

फिर रेखा ने उसे चाय पिलाई । वह नयना की आवभगत उसकी शान के अनुसार ही कर रही थी । नयना वहां जितनी देर बैठी रही, रेखा से यही पूछती रही कि उसे उसका असली नाम कैसे मालूम हुआ, पर रेखा तो इस स्थिति से आनन्दित हो रही थी । वह रहस्य से पर्दा हटा अपना यह आनन्द नहीं खोना चाहती थी। उसने नयना को कुछ बताकर न दिया । बस यही कहा

"नयना जी, आप बस उद्घाटन के दिन का इतजार करें । इस राज से, कि मैने आपको किस तरह पहचाना, अब उसी दिन पर्दा उठेगा । "

एक डेढ घन्टे बाद नयना जब जाने के लिए उठी तो रेखा उसे बाहर तक छोडने, आई। स्टेनगनधारी , जो नयना का बाॅडीगार्ड था, ने नयना को आते देखा तो ज़ल्दी-से गाडी का पिछला दरवाजा खोला! नयना के बैठने के बाद दरवाजा बद किया ओर खुद ड्राइवर के बराबर वाली सीट पर बैठ गया।

गाडी. जब गेट से बाहर निकल गई तो रेखा झूमती हुई अपने आफिस में आई। उसने नयना के बनाए चित्रों को एकएक कर दोबारा देखा।

मन चाह रहा था कि फोन करके भैय्या को बुला ले और उन्हें यह तस्वीरे दिखाये, लेकिन वह फैसला का चुकीं थी कि उद्घाटन वाले दिन से पहले एक-दूसरे के बारे में उन्हें हवा भी न लगने देगी। और जब ये अचानक एक दुसरे को देखेंगे तो वह क्षण केसे आनन्दप्रद होंगे।

उस दिन वह शाम को घर पहुची तौ प्रतिदिन की तरह इंन्द्रजीत उसका प्रतिक्षक था । रेखा का अग' अग' ही तो खुशी के हिलोरे में था। वह अपनी खुशी दबा नहीं पा रही थी ।

इन्द्रजीत्त से भी उसकी मनोस्थिति छिपी न रही और वह पूछे बिना न रह सका "भई खैरियत तो है। "

रेखा इस कदर खुश थी कि वह अपने भाई के गले में बाहें डाले बिना न रह सकी--"भैय्या मेरे प्यारे भैया! " उसने खुशी से झूमते हुए कहाl

"हे प्रभु! खैर है। "

"आज में बहुत खुश हूं। इतनी खुश हू कि बता नहीँ सकती । "

"ओह । लगता है वह आर्टिस्ट महिला कुछ ज्यादा ही अच्छी तस्वीरें लेकर आ गई है । "

"उफ...बस मत पूछो । उन तस्वीरों ने तो पागल ही कर दिया है और जब आप देखेंगे तो अपने होश गवा बैठेंगे ।"

"तस्वीरों को देखकर । " इन्द्र मुस्करा दिया ।

"तस्वीरों को भी और उस सुंदरी को भी । " बडी. शौखी के साथ कहा रेखा ने ।

"कोई बेहद खूबसूरत चीज है क्या?"

"बस, भैय्या मुझसे कुछ न पूछिये ।"

"चलो, नहीँ पूछने। हम खुद देख लेंगे। हमे आपकी आर्ट गेलरी में आने की इजाजत तो होगी ना । "

"इजाजत...या...उन तस्वीरों की प्रदर्शनी का तो उद्घाटन आपके हाथों होना है।"

"जग ह्रसाईं' कराने का इरादा है। बहन की आर्ट गेलरी उद्घाटन करने वाला भाई । लोग क्या कहेंगे?" इन्द्र गम्भीर हौते बोला।

"लोगों को मारो गोली । मैं बस इतना जानती हूं कि इस प्रदर्शनी का उद्घाटन आपके अलावा कोई नहीं का सकता ।"

”पता नहीं भई, क्या सोच और कर रही हो । मेरे ख्याल में तुम्हें भूख लग रही है, इसलिए उल्टी-सीधी बातें हो रही हैं । आओ खाना खा लो । "

"भैय्या! " रेखा उसे आखे दिखाती बोली "आप समझ रहे है कि मै पागल हो गई हूं। "

"नहीं भई । " इन्द्र मुस्कराया"मै भला ऐसा समझ सकता हूं। "

"मै वाकई पागल हो गई हूं। वह आर्टिस्ट थी ही ऐसी । "

"हे भगवान्! " इन्द्रजीत्त ने अपना सिर थाम लिया "रेखा, प्लीज । अगर तुम्हें भूख नहीं है तो मत खाओ खाना, लेकिन मुझे तो खाने दो । "

"मुझे भूख क्यों नहीं है-मुझे तो जबरदस्त भूख लगी है। " यह कहकर रेखा खाने पर इस तरह टूट पडी. जैसै बाराती शादी के खाने पर टूटते है।

और फिर उद्घाटन वाले दिन भी लोगो का कुछ इस्री तरह का हाल था ।

लोग टुट पड रहे थे । रेखा ने अकल' बलदेव क्रो विश्वास में लेकर उन्हें इस उद्घाटन समारोह का इंचार्ज बना दिया था । बलदेव राज एक कालेज में प्रोफेसर थे.. .असरो रसूख भी था और लोगों से सम्बन्ध भी । उन्होंने इस समारोह में शहर के चुने हुए लोगों की भीड़ जुटा ली थी । नयना को रेखा ने अपने आफिस में बैठा दिया था । उसके साथ बलदेव अक्ल की बेटी बर्षा, उसकी सहेलियां बैठी थीं । रेखा आँफिस का दरवाजा वन्द करके निकल गई थी । इन्द्रजीत निश्चित वक्त पर पहुच' गया । आज उसने डार्क ब्राउन सूट पहन रखा था । इस रग ने गोरे चिट्टे इन्द्रजीत के व्यक्तित्व को और भी निखार दिया था ।

"फीता" काटने से पहले बलराज अकल ने कुछ शब्द आर्टिस्ट के बारे में कहे

"लेडिज एण्ड जेन्टलमेन ये पेंटिग्स देख आप यकीनन थ्रोड़ा सा चौकेगे। यह अनोखी -इनका कला की दृष्टि से मूल्यांकन तो क्ला पारखी ही करेगे लेकिन मै इतना जानता हू कि 'बिषय-वस्तु' के दृष्टिकोण से आप इन्हें अलग पायेगे!"

"… ये सारी तस्वीरें एक कहानी है और इन्हें जिस महिला आर्टिस्ट ने बनाईं हैं वह पर्दे के पीछे रहना चाहती है। बहरहाल, आप देखिये और छिपे फनकार को दाद दीजिये। अब में इन्द्रजीत जी सै अनुरोध करूंगा कि वह 'रिबन' काटकर इस प्रदर्शन का विधिबत् उदघाटन करें । धन्यवाद । "

तब रेखा ने चादी' की प्लेट में रखी कैची अपने भाई के सामने की । इन्द्रजीत ने मुस्कराते हुए कैची उठाई और तालियों की गूज' में 'रिबन' काट दिया ।

और फिर जब इन्द्रजीत दूसरे लोगों के साथ " पेटिग्स" देखने अदर जाने लगा तो रेखा ने बड़े प्यार से उसका हाथ थाम लिया और सरगोशी में बोली

"तस्वीरे देखने से पहले तस्वीर वाली को तो देख लें, भैय्या । " वह इन्द्र का हाथ पकडे अपने आँफिस की तरफ बडी ।

"यानि कि वह देवी जी यहा मौजूद हैँ। " इन्द्र ने हैरत दर्शाई ।

"जी । "

"लेकिन वह तो पर्दे के पीछे रहना चाहती है? "

"आपसे क्या पर्दा-उनका पर्दा तो लोगों से है। " रेखा अर्थपूर्ण अदाज में मुस्कराईं ।

"देखो रेखा कही पिटवा न देना । " इन्द्र ने चुटकी ली ।

"अरमान तो पिटने पिटवाने का ही है । " रेखा चहकी ।

अपने आँफिस के दरवाजे पर पहुंचकर' उसने दस्तक दी ।
 

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