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गगा मोसी का दरबाजा बंद था । अमर ने हल्का सा धक्का दिया तो वह फौरन खुल गया और दरवाजा खुलते ही उसे जो कुछ नजर आया उसके होश उडा देने के लिए काफी था।
सामने देखा लिहाफा ओढे बैठी थी। वह बेअख्तयार ही आगे बढा, और मारे खुशी के लगभग चीखते हुए बोला--"अरे रेखा । तुम ।"
"जी भाई ! में ।" रेखा ने अपना हाथ आगे बढा दिया । अमर उसका हाथ 'थामते हुए बोला- ”वाकई! यह तो बडी. जबरदस्त खुशखबरी है-हम सबके लिए । "
"ओह । " गगा मौसी मुस्करा दी"यानि कि माया ने तुम्हें बताया नहीं था I "
"कमबख्त ने सिर्फ इतना ही बताया कि एक जबरदस्त खुशखबरी आपके कमरे में है और में...मै भी कहा अदाजा लगा पाया था कि यह खुबसुरत हो सकती है । "
"यानि कि ‘भाई मूझे भूला ही बेठे है। " रेखा ने जैसै शिकायत की।
"तुम्हें कौन भूल सकता है रेखा । " अमर सजीदगी' से बोला"हम तो रोज ही उस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश करते थे-लेकिन कुछ समझ में नहीं आत्ता था । तुम्हारी वह रहस्यमयी गुमशुदगी और फिर तुम्हारा वह खत । अगर वह खत न मिलता तो हम पुलिस की मदद जरूर लेते। "
"इसका मतलब है कि मेरा पत्र छोड जाना ठीक रहा।"
"हां I इससे हमें यह निश्चिन्तता तो रही कि तुम जहां भी गई हो अपनी मर्जी से गई हो । "
तभी दरवाजा एक दस्तक के साथ खुला और ट्रे उठाये माया ने अन्दर कदम रखा ।
"क्या लाई हो, माया?" अमर ने उसकी तरफ देखते पूछा।
"कॉफी लाईं हू साहब जी I क्या आप भी अण्डा लेंगे । "
"नहीं सिर्फ काफी"। मैं खाना खाकर आया हूं।"
माया ने जल्दी से अण्डा छीलकर छुरी से उसके चार टुकडे किए । उन पर हल्की-सी काली मिर्च डाली और प्लेट रेखा की तरफ बढा. दी I रेखा ने अण्डा खाकर कॉफी का मग हाथ मै ले लिया व धीरे धीरे दो चुस्कियां ली "भई वाह । " वह माया से बोली"सच ही में तुम्हारा जबाव नहीं । बहुत सादा कॉफी बनाई है । "
"हाय ।बीबी आप मुझे बहुत याद आती थी। "
"कोई खास वजह । "
"ऐसी दो प्यारी-प्यारी बातें सुनने के लिए । " माया ने मासूमियत से कहा । माया की इस बात पर तीनों ही हस दिंए थे।
माया कमरे में रुकना चाह रही थी । वह रेखा की कहानी सुनना चाह रही थी । अपनी जिज्ञासा मिटाना चाहती थी। उसे रेखा से वहुत लगाव था । रेखा ने उसे कभी नोकरानी नहीं समझा था । माया के साथ रेखा का रवैया हमेशा दोस्ताना रहा था, पर यह ऐसा मौका था कि वह चाहते हुए भी अपनी मर्जी सै कमरे में रुक नहीं सकती थी और उसे किसी ने रुकने को कहा नहीं सो वह तुरन्त कमरे सै निकल गई ।
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कुछ देर खामोशी रही ।। वै कॉफी चुस्कते रहे और इस खामोशी को अमर ने तोडा। उसने रेखा से पूछा--"क्या हुआ था तुम्हारे साथ? तुम कहा चली गई थी?"
रेखा को अमर की पूछताछ से ही खतरा था । उसके पास अमर के सवालों के जवाब नहीँ थे। जाहिर था अगर सच-सच बता देती तो किसी ने भी उसकी आपबीती पर विश्वास नहीं करना था । खास तौर पर अमर ने तो यही सोचना था कि "यह अपने चेहरे-मोहरे से तो पागल दिखाईं नहीं दे रही लेकिन बातें पागलों बाली कर रही है। "
अमर को आरम्भ में ही गंगा मोसी ने टोक दिया I वह एकदम बोली थी--"अरे अमर ॥ अब आ गई है तो सब बता देगी कि कहा गई थी? अभी तो यह खुद ही अपने आपे में नहीं है। फिलहाल तो इसे आराम की जरूरत है।"
"आपने ठीक कहा-मोसी! इसे आराम करने दिया जाए। सुबह बातें होगी । " यह कहकर अमर उठने लगा । "भाई अब ऐसी भी आराम की जरूरत नहीं है। " रेखा एकदम बोली--" आप कुछ देर तो बैठे। "
अमर रूक गया । कुछ देर तक इधर उधर की बातें होती रहीँ । इसी बीच गगा' मोसी ने उसे रेखा के भाई इन्द्रजीत के भी दिल्ली में बलदेव राज के यहां पहुचने' कीं खुशखबरी सुना दी ।
इन्द्रजौत्त के बारे में सुनकर अमर उछलते हुए बोला था "मौसी! सच-सच बताएं! आज सुबह आपने किसका मुह देखा था ? "
"क्यों? " मौसी उसे घूरने लगी ।
"देखिये ना-आज का दिन कैसा शुभ दिन है? खुशखबरी पर खुशखबरी चली आ रही हैँ । " अमर ह्रसकर बोला ।
"तुम्हारा ही तो देखा था । " मौसी ने मजाक किया।
"मजाक न करें। मेरे से पहले तो माया आपके पास आती है। '"
"हां । वाकई उठते ही सबसे पहले मैं माया की ही शक्ल देखती हूं। लेकिन वह तो मैं रोज ही देखती हू'। आज मैंने सुबह सुबह रेखा की तस्वीर देखी थी। यह मुझे आज बहुत याद आ रही थी ।" कुछ देर बैठकर अमर अपने कमरे में चला गया ।
इस बीच माया बर्तन उठाकर ले गई थी । गगा मौसी ने उसे रेखा का कमरा खोलने व ठीक करने को कह दिया था। उसे कह दिया गया था कि रेखा का कमरा ठीक करने के बाद वह अपने कमरे में सोने के लिए चली जाए । अमर के जाने के बाद गगा मौसी को अचानक बलदेव राज का ख्याल आया ।
"क्यों रेखा, तुम्हारे बलदेव अकल को फोन करें-अव तो तुम्हारी आमद सब पर खुल गई है। " उन्होंने-रेखा से कहा । शायद बलदेव को यह खुशखबरी देने को बेचैन हो रही थी वह ।
"बारह्र सै ऊपर हो रहे हैँ मोसी। " रेखा घडी पर नजर डालते बोली-- "अब तक तो अक्ल सो चुके होंगे।"
"ट्राई करके देख लेते हैं क्या पता जाग ही रहे हो। उन्होंने खुशखबरी सुनाई है तो इधर से भी उसका जवाब जाना चाहिये। हम क्यो पीछे रहे।" मौसी बोली ।
"चलिये ठीका मजा आएगा । " यह कहकर रेखा नम्बर डायल करने लगी ।सयोग से नम्बर फोरन लग गया। पहली घन्टी बजते ही रेखा ने रिसीवर मोसी की तरफ बढा दिया-"घन्टी बज रही है l " मौसी ने रिसीवर सम्भाल लिया।
तीसरी घंटी पर उधर किसी ने रिसीवर उठाया। जब हेल्लो कहा तो गगा' मौसी ने आवाज फोरन पहचान ली । वह बलदेव राज ही था।
"अभी सोये नहीँ बलदेव?“
"अरे गगा तुम । इस वक्त? खैर तो है? " वह परेशान हो उठे थे।
"भई हम भी कम नहीं तुमसे?" गगा के लहजे मे अल्हड सी शोखी भर आई थी ।
" अच्छा ! वैसे यह तो मूझे मालूम है, तुम बडी चीज हों।"
सामने देखा लिहाफा ओढे बैठी थी। वह बेअख्तयार ही आगे बढा, और मारे खुशी के लगभग चीखते हुए बोला--"अरे रेखा । तुम ।"
"जी भाई ! में ।" रेखा ने अपना हाथ आगे बढा दिया । अमर उसका हाथ 'थामते हुए बोला- ”वाकई! यह तो बडी. जबरदस्त खुशखबरी है-हम सबके लिए । "
"ओह । " गगा मौसी मुस्करा दी"यानि कि माया ने तुम्हें बताया नहीं था I "
"कमबख्त ने सिर्फ इतना ही बताया कि एक जबरदस्त खुशखबरी आपके कमरे में है और में...मै भी कहा अदाजा लगा पाया था कि यह खुबसुरत हो सकती है । "
"यानि कि ‘भाई मूझे भूला ही बेठे है। " रेखा ने जैसै शिकायत की।
"तुम्हें कौन भूल सकता है रेखा । " अमर सजीदगी' से बोला"हम तो रोज ही उस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश करते थे-लेकिन कुछ समझ में नहीं आत्ता था । तुम्हारी वह रहस्यमयी गुमशुदगी और फिर तुम्हारा वह खत । अगर वह खत न मिलता तो हम पुलिस की मदद जरूर लेते। "
"इसका मतलब है कि मेरा पत्र छोड जाना ठीक रहा।"
"हां I इससे हमें यह निश्चिन्तता तो रही कि तुम जहां भी गई हो अपनी मर्जी से गई हो । "
तभी दरवाजा एक दस्तक के साथ खुला और ट्रे उठाये माया ने अन्दर कदम रखा ।
"क्या लाई हो, माया?" अमर ने उसकी तरफ देखते पूछा।
"कॉफी लाईं हू साहब जी I क्या आप भी अण्डा लेंगे । "
"नहीं सिर्फ काफी"। मैं खाना खाकर आया हूं।"
माया ने जल्दी से अण्डा छीलकर छुरी से उसके चार टुकडे किए । उन पर हल्की-सी काली मिर्च डाली और प्लेट रेखा की तरफ बढा. दी I रेखा ने अण्डा खाकर कॉफी का मग हाथ मै ले लिया व धीरे धीरे दो चुस्कियां ली "भई वाह । " वह माया से बोली"सच ही में तुम्हारा जबाव नहीं । बहुत सादा कॉफी बनाई है । "
"हाय ।बीबी आप मुझे बहुत याद आती थी। "
"कोई खास वजह । "
"ऐसी दो प्यारी-प्यारी बातें सुनने के लिए । " माया ने मासूमियत से कहा । माया की इस बात पर तीनों ही हस दिंए थे।
माया कमरे में रुकना चाह रही थी । वह रेखा की कहानी सुनना चाह रही थी । अपनी जिज्ञासा मिटाना चाहती थी। उसे रेखा से वहुत लगाव था । रेखा ने उसे कभी नोकरानी नहीं समझा था । माया के साथ रेखा का रवैया हमेशा दोस्ताना रहा था, पर यह ऐसा मौका था कि वह चाहते हुए भी अपनी मर्जी सै कमरे में रुक नहीं सकती थी और उसे किसी ने रुकने को कहा नहीं सो वह तुरन्त कमरे सै निकल गई ।
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कुछ देर खामोशी रही ।। वै कॉफी चुस्कते रहे और इस खामोशी को अमर ने तोडा। उसने रेखा से पूछा--"क्या हुआ था तुम्हारे साथ? तुम कहा चली गई थी?"
रेखा को अमर की पूछताछ से ही खतरा था । उसके पास अमर के सवालों के जवाब नहीँ थे। जाहिर था अगर सच-सच बता देती तो किसी ने भी उसकी आपबीती पर विश्वास नहीं करना था । खास तौर पर अमर ने तो यही सोचना था कि "यह अपने चेहरे-मोहरे से तो पागल दिखाईं नहीं दे रही लेकिन बातें पागलों बाली कर रही है। "
अमर को आरम्भ में ही गंगा मोसी ने टोक दिया I वह एकदम बोली थी--"अरे अमर ॥ अब आ गई है तो सब बता देगी कि कहा गई थी? अभी तो यह खुद ही अपने आपे में नहीं है। फिलहाल तो इसे आराम की जरूरत है।"
"आपने ठीक कहा-मोसी! इसे आराम करने दिया जाए। सुबह बातें होगी । " यह कहकर अमर उठने लगा । "भाई अब ऐसी भी आराम की जरूरत नहीं है। " रेखा एकदम बोली--" आप कुछ देर तो बैठे। "
अमर रूक गया । कुछ देर तक इधर उधर की बातें होती रहीँ । इसी बीच गगा' मोसी ने उसे रेखा के भाई इन्द्रजीत के भी दिल्ली में बलदेव राज के यहां पहुचने' कीं खुशखबरी सुना दी ।
इन्द्रजौत्त के बारे में सुनकर अमर उछलते हुए बोला था "मौसी! सच-सच बताएं! आज सुबह आपने किसका मुह देखा था ? "
"क्यों? " मौसी उसे घूरने लगी ।
"देखिये ना-आज का दिन कैसा शुभ दिन है? खुशखबरी पर खुशखबरी चली आ रही हैँ । " अमर ह्रसकर बोला ।
"तुम्हारा ही तो देखा था । " मौसी ने मजाक किया।
"मजाक न करें। मेरे से पहले तो माया आपके पास आती है। '"
"हां । वाकई उठते ही सबसे पहले मैं माया की ही शक्ल देखती हूं। लेकिन वह तो मैं रोज ही देखती हू'। आज मैंने सुबह सुबह रेखा की तस्वीर देखी थी। यह मुझे आज बहुत याद आ रही थी ।" कुछ देर बैठकर अमर अपने कमरे में चला गया ।
इस बीच माया बर्तन उठाकर ले गई थी । गगा मौसी ने उसे रेखा का कमरा खोलने व ठीक करने को कह दिया था। उसे कह दिया गया था कि रेखा का कमरा ठीक करने के बाद वह अपने कमरे में सोने के लिए चली जाए । अमर के जाने के बाद गगा मौसी को अचानक बलदेव राज का ख्याल आया ।
"क्यों रेखा, तुम्हारे बलदेव अकल को फोन करें-अव तो तुम्हारी आमद सब पर खुल गई है। " उन्होंने-रेखा से कहा । शायद बलदेव को यह खुशखबरी देने को बेचैन हो रही थी वह ।
"बारह्र सै ऊपर हो रहे हैँ मोसी। " रेखा घडी पर नजर डालते बोली-- "अब तक तो अक्ल सो चुके होंगे।"
"ट्राई करके देख लेते हैं क्या पता जाग ही रहे हो। उन्होंने खुशखबरी सुनाई है तो इधर से भी उसका जवाब जाना चाहिये। हम क्यो पीछे रहे।" मौसी बोली ।
"चलिये ठीका मजा आएगा । " यह कहकर रेखा नम्बर डायल करने लगी ।सयोग से नम्बर फोरन लग गया। पहली घन्टी बजते ही रेखा ने रिसीवर मोसी की तरफ बढा दिया-"घन्टी बज रही है l " मौसी ने रिसीवर सम्भाल लिया।
तीसरी घंटी पर उधर किसी ने रिसीवर उठाया। जब हेल्लो कहा तो गगा' मौसी ने आवाज फोरन पहचान ली । वह बलदेव राज ही था।
"अभी सोये नहीँ बलदेव?“
"अरे गगा तुम । इस वक्त? खैर तो है? " वह परेशान हो उठे थे।
"भई हम भी कम नहीं तुमसे?" गगा के लहजे मे अल्हड सी शोखी भर आई थी ।
" अच्छा ! वैसे यह तो मूझे मालूम है, तुम बडी चीज हों।"