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रेखा के लिए यह अजीब रात थी। बडे अजीब अंदाज में गुजरी।
वह करवटें बदलती रही । सोना चाहा पर सो न सकी । बार बार रासमोन का चेहरा सामने आत्ता था । यहीँ अहसास कचीटता रहा कि उसने रासमोन का दिल तोड़ा है ।
वेसे उसका यूं मायूस हौकर चला जाना ही अच्छा । वह रूक जाता तो जाने और क्या-क्या कहता और उसके कहे वे शब्द रेखा के पावो की जजीर चन जाते । रेखा को अहसास था कि वह एक मायावी लोक में और गेर-इन्सानी प्राणियों के बीच है । सो 'एक हसान' व 'गैर इंसान' का मिलाप भी मुमकिन नहीं । फिर उसै तो हर कीमत्त पर अपनी दुनिया में वापिस जाना था । वहां जाकर अपने चाचा रमाकात सै उसकी ज्यादतियों ब गुनाहों का हिसाब लेना था । रमाकांत उसके बाप कृष्णकांत का कातिल था । उसके भाई इंद्रजीत को इस नर्क मे धकेलने की जिम्मेवारी भी उसी पर थी । वह अभी इन बखेडों में केसे फंस सकती थी?
यही सब सोचते-सोचते जाने कब रेखा को नींद आ गई । और फिर प्रात: उजाला फैलने के बाद एक दासी ने गुलाब की कली सै उसके गालों पर स्पर्श करके उसे जगाया ।
रेखा जागी तो दासी का मुस्कराता चेहरा सामने था । दासी ने अभिवादन किया व फिर बोली "जल्दी तेयार हो जाएं कासगन आपके प्रतीक्षक हैँ। "
रेखा ने बिस्तर छोड़ दिया । हाथ मुह धोये और फिर दासियों ने उसे तेयार होने में मदद की ओर रेखा दासियों के साथ बिभित्र रास्तों सै होती हुई कासगन के कमरे में पहुच गई । कासगन उसे देखकर खड़ा हो गया ।
"आओ, रेखा ! नाश्ता कर लो । " उसने मेज की तरफ इशारा किया । मेज पर बिभिन्न व्यजन चिने हुए थे। रेखा ने अपनी पसन्द का नाश्ता किया ।
"रेखा मैंने कुएं के वासियों को बुलवा लिया है। वे बाहर मोजूद है। वे लोग तुम्हें उस 'मुक्ति द्वार' तक पहुचा देंगे। उससे आगे ये लोग नहीं जा सकतें । " कासगन ने बताया ।
"ठीक है, मै वहां तक पहुच गई तो फिर आगे जाने की कोई-न कोई राह निकल आएगी । ” रेखा बोली ।
"आओ चलें।" कासगन उठ खड़ा हुआ।
वे महल के दरवाजे पर पहुचे । रेखा ने वहा एक कुर्सी देखी । कुर्सी खाली थी व उसके ही पास कुए के वासी थे । वे दो थे और वे दोनों वही थे जो रेखा को 'मुक्ति द्वार' से यहां तक उडाकर लाए थे।
रेखा ने दरवाजे से बाहर कदम रखा और इधर उधर नजर दोडाई ।
"रासमोन कहां है? " रेखा ने पूछा ।
"वह अपना कमरा बंद करके सो रहा है । " कासगन ने बताया-"वह रातभर जागता रहा है। मैने उसे उठाया नहीं, कहो तो उठा दूं। ”
"नहीँ-नहीं उसे सोने दीजिए। " रेखा बोल उठी ॥ कासगन बोला--"रेखा इस कुर्सी पर बैठ जाओ । ये दोनों तुम्हें उडाकर ले जाएगे' । "
रेखा खामोशी से कुर्सी पर बैठ गई ।
" अच्छा, रेखा जाओ । आसमान वाला तुम्हारी हिफाजत करे। ” कासगन कीं आवाज भर्रा गई । वो अपने अश्रु रोकने की कोशिश कर रहा था।
"अच्छा, कासगन असमान वाला तुम्हारी भी हिफाजत करे । " रासमोन से कह देना-"वो मुझे याद आता रहेगा । "
"लो, वह आ गया, रेखा। " कासगन ने दरवाजे की तरफ इशारा किया ।
रेखा ने मुडकर. देखा-रासमोन इधर ही आ रहा था । उसके बाल बिखरे हुए थे । चेहरे पर उदासी थी । रेखा को वो मजनूं की तस्वीर नजर आया । साफ लग रहा था वो बिस्तर से उठकर सीधे इधर आया था ।रेखा के दिल की धडकने बरबस ही तीव्र हो गई । वह मत्र'-मुग्ध स्री ही कुर्सी सै उठी व रासभोन की तरफ बढ, गई I कासगन वहीँ खडा था । रेखा इतनी आगे बढ… गई थी कि कासगन उन दोनों की बातचीत नहीँ सुन सकता था ।
अब उनके पास कहने सुनने को रह ही क्या गया था? यह आखिरी मुलाकात थी । कुछ ही देर बाद रेखा को उड जाना था ।
"रासमोन, अच्छा हुआ तुम आ गये । " रेखा मुस्कराते हुए, अपनत्व सै बोली ।
“सोचा तो था कि जाते हुए न देखूगा, लेकिन दिल ने बगावत कर दी। मजबूर होकर आ गया । "
"कितना अच्छा है तुम्हारा दिल? " बेअख्तयार ही बोली थी रेखा।
"और मैं?" बडे. शोक से पूछा गया।
"तुम बहुत बुरे हो।"
"वह क्यो? " रासमोन हैरान हुआ था ।
"रात को कितनी आवाजें दी तुम्हें, लेकिन तुमने पलटकर भी नहीं देखा। " रेखा ने जैसे शिकायत की।
"तुम भी अभी वैसा ही करोगी । यहाँ से चली जाओगी और मैं आवाजें देता रह जाऊगा। " रासमोन ने उदास सी मुस्कान के साथ कहा।।
"यह मेरी मजबूरी है। " रेखा ने गहरी सॉस ली ।
"तुम मेरी दुनिया में आई ही क्यों थी?" रासमोन भर्राई आवाज में बोला।
"मैं कहा आईं? " रेखा बलात् ही मुस्कराई-- "मुझें तो लाया गया था।"
"लाया गया था तो मुझें सोने देती क्यो मुझे जादू से मुक्त कराया?"
"तुम्हें अफसोस हे कि जादूगरनी सारबरी के न ही सके?" रेखा ने शोखी से कहा।
"शायद हां कम से कम वह मेरी तो हो जाती । "
" अफसोस क्यों करते हो फिर चले जाना शिकार पर?" रेखा ने जैसै सुझाया-- "उसे तो अब भी तुम्हारी इतजार होगी ।"
"जाते हुए ऐसी बातें न करो । " रासमोन उसकी आखों में झाककर बोला।
"अच्छा! अब मुझें इजाजत दो । अब चलती हूं। मेरी कोई बात बुरी लगी हो तो माफ करना। "
"रेखा । " रासमोन ने पुकारा।
रेखा पलटते-पलटते रुक गई और उसे साबालियां नजरों से देखा।
"यह कबूल करो। " रासमोन ने अपने लिबास से सुर्ख गुलाब की एक ताजी कली निकाली। "
वह करवटें बदलती रही । सोना चाहा पर सो न सकी । बार बार रासमोन का चेहरा सामने आत्ता था । यहीँ अहसास कचीटता रहा कि उसने रासमोन का दिल तोड़ा है ।
वेसे उसका यूं मायूस हौकर चला जाना ही अच्छा । वह रूक जाता तो जाने और क्या-क्या कहता और उसके कहे वे शब्द रेखा के पावो की जजीर चन जाते । रेखा को अहसास था कि वह एक मायावी लोक में और गेर-इन्सानी प्राणियों के बीच है । सो 'एक हसान' व 'गैर इंसान' का मिलाप भी मुमकिन नहीं । फिर उसै तो हर कीमत्त पर अपनी दुनिया में वापिस जाना था । वहां जाकर अपने चाचा रमाकात सै उसकी ज्यादतियों ब गुनाहों का हिसाब लेना था । रमाकांत उसके बाप कृष्णकांत का कातिल था । उसके भाई इंद्रजीत को इस नर्क मे धकेलने की जिम्मेवारी भी उसी पर थी । वह अभी इन बखेडों में केसे फंस सकती थी?
यही सब सोचते-सोचते जाने कब रेखा को नींद आ गई । और फिर प्रात: उजाला फैलने के बाद एक दासी ने गुलाब की कली सै उसके गालों पर स्पर्श करके उसे जगाया ।
रेखा जागी तो दासी का मुस्कराता चेहरा सामने था । दासी ने अभिवादन किया व फिर बोली "जल्दी तेयार हो जाएं कासगन आपके प्रतीक्षक हैँ। "
रेखा ने बिस्तर छोड़ दिया । हाथ मुह धोये और फिर दासियों ने उसे तेयार होने में मदद की ओर रेखा दासियों के साथ बिभित्र रास्तों सै होती हुई कासगन के कमरे में पहुच गई । कासगन उसे देखकर खड़ा हो गया ।
"आओ, रेखा ! नाश्ता कर लो । " उसने मेज की तरफ इशारा किया । मेज पर बिभिन्न व्यजन चिने हुए थे। रेखा ने अपनी पसन्द का नाश्ता किया ।
"रेखा मैंने कुएं के वासियों को बुलवा लिया है। वे बाहर मोजूद है। वे लोग तुम्हें उस 'मुक्ति द्वार' तक पहुचा देंगे। उससे आगे ये लोग नहीं जा सकतें । " कासगन ने बताया ।
"ठीक है, मै वहां तक पहुच गई तो फिर आगे जाने की कोई-न कोई राह निकल आएगी । ” रेखा बोली ।
"आओ चलें।" कासगन उठ खड़ा हुआ।
वे महल के दरवाजे पर पहुचे । रेखा ने वहा एक कुर्सी देखी । कुर्सी खाली थी व उसके ही पास कुए के वासी थे । वे दो थे और वे दोनों वही थे जो रेखा को 'मुक्ति द्वार' से यहां तक उडाकर लाए थे।
रेखा ने दरवाजे से बाहर कदम रखा और इधर उधर नजर दोडाई ।
"रासमोन कहां है? " रेखा ने पूछा ।
"वह अपना कमरा बंद करके सो रहा है । " कासगन ने बताया-"वह रातभर जागता रहा है। मैने उसे उठाया नहीं, कहो तो उठा दूं। ”
"नहीँ-नहीं उसे सोने दीजिए। " रेखा बोल उठी ॥ कासगन बोला--"रेखा इस कुर्सी पर बैठ जाओ । ये दोनों तुम्हें उडाकर ले जाएगे' । "
रेखा खामोशी से कुर्सी पर बैठ गई ।
" अच्छा, रेखा जाओ । आसमान वाला तुम्हारी हिफाजत करे। ” कासगन कीं आवाज भर्रा गई । वो अपने अश्रु रोकने की कोशिश कर रहा था।
"अच्छा, कासगन असमान वाला तुम्हारी भी हिफाजत करे । " रासमोन से कह देना-"वो मुझे याद आता रहेगा । "
"लो, वह आ गया, रेखा। " कासगन ने दरवाजे की तरफ इशारा किया ।
रेखा ने मुडकर. देखा-रासमोन इधर ही आ रहा था । उसके बाल बिखरे हुए थे । चेहरे पर उदासी थी । रेखा को वो मजनूं की तस्वीर नजर आया । साफ लग रहा था वो बिस्तर से उठकर सीधे इधर आया था ।रेखा के दिल की धडकने बरबस ही तीव्र हो गई । वह मत्र'-मुग्ध स्री ही कुर्सी सै उठी व रासभोन की तरफ बढ, गई I कासगन वहीँ खडा था । रेखा इतनी आगे बढ… गई थी कि कासगन उन दोनों की बातचीत नहीँ सुन सकता था ।
अब उनके पास कहने सुनने को रह ही क्या गया था? यह आखिरी मुलाकात थी । कुछ ही देर बाद रेखा को उड जाना था ।
"रासमोन, अच्छा हुआ तुम आ गये । " रेखा मुस्कराते हुए, अपनत्व सै बोली ।
“सोचा तो था कि जाते हुए न देखूगा, लेकिन दिल ने बगावत कर दी। मजबूर होकर आ गया । "
"कितना अच्छा है तुम्हारा दिल? " बेअख्तयार ही बोली थी रेखा।
"और मैं?" बडे. शोक से पूछा गया।
"तुम बहुत बुरे हो।"
"वह क्यो? " रासमोन हैरान हुआ था ।
"रात को कितनी आवाजें दी तुम्हें, लेकिन तुमने पलटकर भी नहीं देखा। " रेखा ने जैसे शिकायत की।
"तुम भी अभी वैसा ही करोगी । यहाँ से चली जाओगी और मैं आवाजें देता रह जाऊगा। " रासमोन ने उदास सी मुस्कान के साथ कहा।।
"यह मेरी मजबूरी है। " रेखा ने गहरी सॉस ली ।
"तुम मेरी दुनिया में आई ही क्यों थी?" रासमोन भर्राई आवाज में बोला।
"मैं कहा आईं? " रेखा बलात् ही मुस्कराई-- "मुझें तो लाया गया था।"
"लाया गया था तो मुझें सोने देती क्यो मुझे जादू से मुक्त कराया?"
"तुम्हें अफसोस हे कि जादूगरनी सारबरी के न ही सके?" रेखा ने शोखी से कहा।
"शायद हां कम से कम वह मेरी तो हो जाती । "
" अफसोस क्यों करते हो फिर चले जाना शिकार पर?" रेखा ने जैसै सुझाया-- "उसे तो अब भी तुम्हारी इतजार होगी ।"
"जाते हुए ऐसी बातें न करो । " रासमोन उसकी आखों में झाककर बोला।
"अच्छा! अब मुझें इजाजत दो । अब चलती हूं। मेरी कोई बात बुरी लगी हो तो माफ करना। "
"रेखा । " रासमोन ने पुकारा।
रेखा पलटते-पलटते रुक गई और उसे साबालियां नजरों से देखा।
"यह कबूल करो। " रासमोन ने अपने लिबास से सुर्ख गुलाब की एक ताजी कली निकाली। "