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"उसने मुझे गुलाम बना लिया था। मुझ पर कब्जा कर रखा था । ' ' इन्द्रजीत ने जेसे सफाई दी।
"यह क्यों भ्रूल जाते हो कि उसने तुम्हारी जान बचाई थी। अगर उसने ऐसा न किया होता तो आजतुम कहां होते? "
' 'इसके लिए में उसका शुक्रगुजार था । मैंने उसकी बहुत सेवा की। उसका गुलाम बनकर रहा.. . ।"
“सेबा...?उसकी हत्या करवा के...।" ' ' वह विषाक्त लहजे में ब्रोली-' 'वाह I. क्या सेवा की है तुमने उसकी । ' '
“ आखिर तुम हो कौन? ' ' इन्द्रजीत असहाय-सा बोला।
' 'मेरे जादूगर । मै तुम्हारी सजा हूँ...एक खूबसूरत सजा...।” उस रूपसी ने अजीब-सा अदाज अपना लिया था । और जाने क्या था उसके स्वर में कि इंद्रजीत ने अपनी रगों में एक सर्द लहर दौड गई महसूस की।
उसने अपने सूख चले होठों पर जिव्हा फेरी और पूछा-"कहां से आई हो? ' '
"मुझे देवा काली ने भेजा है। ' '
"कौन देवा काली? "
"वहीँ देवा काली, जिसे राजूमदारी ने अपने अंतिम क्षणों में, अपनी सहायता के लिए पुकारा था तो उस समय मैं देवा काली क्रे चरणों में बैठी थी । राजूमदारी की पुकार सुनकर देवा काली ने मुझे इशारा किया। उसके आदेश पालन में में राजू मदारी की सहायता को गई। लेकिन समय बीत चुका था । मैं राजूमदारी को बचा नहीं सकी।। मरते हुए उसकी इच्छा थी कि उसकी मौत का प्रतिशोध लिया जाए कि उसके साथ धोखा करने वाले को बख्शा न जाए। सो तुमने सुन लिया कि मैने योगी दयाल की क्या दुर्गत बनाई । वो अपनी जान से गया। अब तुम्हारी बारी है । मैं तुम्हें मारूगी नहीं | इसलिए कि मै' स्वय तुम पर मर गई हूँ। अब तुम सिर्फ मेरे लिए जीवित रहोगे। मेरे होकर रहोगे, मेरी कैद मे रहोगे !"
"और अगर मैं तुम्हारी कैद में न रहना चाहूँ तो... । "
"बात तुम्हारे चाहने की नहीं है-मेरे चाहने की है। ' ' वह हसी', उसकी हसी' में व्यग्य' था।
“लेकिन मैं किसी और को चाहता हूं। उसी की कैद में रहना चाहता हू।" इन्द्रजीत नै अपने दिलं की कही।
" ~ अब भूल जाओ उसको।" वह इन्द्रजीत क्रो गहरी नजरो से देखते हुए बोली---"मैं जानती हूँ वो आ रही है I तुमने उसे रास्ता दिखाने के लिए अगनी कमीज राह में फैक दी है और वह स्वयं तुम्हें दूढते हुए अतत': इस चबूतरे तक पहुच जाएगी लेकिन उसके आते ही यहा कुछ नहीं रहेगा। ' '
”औह । अच्छा हुआ कि यह तो मालूम हो गया कि नयना आखिरकार यहां तक पहुच जाएगी। अब मैं यहां से नहीं हिंलूगा'। यहीं बैठा रहूगा। उसके आने की इंतजार करूगा... । ‘ ‘ इन्द्रजीत ने निर्णायक लहजे में कहा ।
' 'क्या चाहते हो...तुम्हारी नयना को अधा का दू ताकि वह यहा तक कभी पहुच ही न सके। " उस रूपसी ने यह बात बेहद सर्द और निर्मम लहजे में कही थी ।
"कोई खास अमल जानती हो क्या?'' इन्द्रजीत ने बिषय बदलते हुए पुछा ।
"इस जगत में एक नर्म आरामदायक कालीन पर बैठे हो। इसके बाद भी तुम्हे किसी अमल का सबूत चाहिये…।"
"मैं तुम्हारा नाम जान सक्ला हूँ?"
' 'मेरा नाम बकाल है । ’ '
"बकाल...यह क्या नाम हुआ भला।" इन्द्रजीत सचमुच ही उलझ गया था ।
”बकाल का अर्य है -रेगिस्तान की शहजादी। " उसने मुस्कराते हुए बताया-- ' 'क्या मैं तुम्हें बकाल दिखाई नहीं देती? रेगिस्तान की शहजादी नजर नहीं आती?"
इंद्रजीत उसको इस बात का क्या जवाब देता । वह निसन्देह ही एक बेहद सुन्दर आकर्षक युवती थी । एक सवप्न सुन्दरी। उस पर उठने वाली नजर मुश्किल से ही झुकती थी । अब वह मरुस्थल की शहजादी थी या पहाडों की मलिका थी यह इन्द्रजीत की समस्या नहीं थी। इन्द्रजीत की समस्या तो केवल यही थी कि नयना किसी भी तरह यहा तक पहुच जाये और उसको लेकर निकल जाए। इसी हालात ने इंद्रजीत की खोपडी घुमा दी थी ।। वह खुफजदा होने की हद तक चिन्तित हो उठा था ।
बकाल ने अब और अधिक समय नष्ट करना उचित न समझा। वह शीघ्र अतिशीघ्र अपनी कारवाई पूरी कर लेना चाहती थी । वह जानती थी कि नयना को यहा तक पहुचने में बहुत देर लगेगी । फिर भी वह खामखाह की उलझनों में नहीं पडना चाहती थी।
उसने इन्द्रजीत को मादक-नशीली निगाहों सै देखा। बेहद मनमोहक अंदाज में मुस्कराई और फिर शहद से मीठे लहजे मे बोली---
"इंद्र ! मेरा एक काम करो । "
"हां, बोलो… ।" इन्द्रजीत स्वय को निर्भय साबित करना चाहता था और इसमें वह काफी हद तक सफल भी नजर आ रहा था ।
"तुम्हारा घोडा कहा' है?" बकाल नै पूछा ।
"निकट ही है वह उधर उन पेडों के झुण्ड में है । " इन्द्र ने बताया ।
" जाओ, उसकी दुम का एक बाल ले आओ । " बकाल ने बडी, बिचित्र फरमाईश क्री।
"बाल…? क्या करोगी?" इन्द्र उछल ही तो पड़ा था।
"तुम तो बडे जादूगर हो-तुम्हें तो मालूम होगा । " उसने हंसकर कहा।
"नहीं मैं नहीं जानता। मैंने आज तक घोडे के बाल सै कोई चमत्कार नहीं दिखाया।”
"अच्छा, फिर जाओ, लेकर आओं । मैं आज तुम्हें एक जबरदस्त तमाशा दिखाती हूँ अगर पंसद आया और तुम सीखना चाहोगे तो तुम्हें सिखा भी दुगो' । " बकाल ने उसे अपनी चमकती-प्यासी आखो सै देखते हुए कहा ।
“इन्द्रजीत चबूतरे से उतर गया। वह उन पेडों के झुण्ड की तरफ बड़ गया, जहा उसका घोडा, खडा था। वह घोडे के निकट पहुंचा तो उसके दिमाग में एक छन्नाका-सा हुआ। उसने सोचा कि क्यो न मोके का फायदा उठाए और घोडे पर सवार होका निकल ले । यह बकाल उसका कुछ न कर सकेगी-बस देखती ही रहेगी । पर फिर यह ख्याल भी आया कि अगर वह यहा से निक्ल गया तो नयना को केसे पाएगा । जब तक कि वह जगल सै बाहर निक्लेगा, तब तक तो नयना यहा' पहुच जाएगी । फिर यह मायावी बकाल उसे भला कहा छोडेशी । फिर यह जाने नयना की क्या हालत करे, हो सकता है उसे अंधा ही बना दे। हां अभी उसे कुछ देर सब्र करना चाहिये। उसे देखना चाहिये कि वह घोड़े के बाल का क्या करती हे? कैसा तमाश दिखाना चाहती हे I हो सकता है तब तक नयना उसे तलाश करते हुए यहां तक पहुच जाए ।
नयना के ख्याल से इन्द्रजीत के दिल में दुस्साहस दिखाने का ख्याल निक्ल गया।
इन्द्रजीत ने यह भी सोचा कि नयना के साथ मिलकर वह शायद इस बकाल की बच्ची को ठिकाने लगा सके। इन्द्रजीत घोडे की दुम का बाल तोड बापस बकाल के पास पहुचा' I
"यह लो ।" बाल, बकाल के सामनें लहराते हुए बोला था वह॥॥
बकाल ने बाल ले लिया फिर दोनों हाथों से पकडकर खींचकर देखा। खासा लम्बा और मजबूत बाल था। वह बाल थामे इन्द्रजीते की तरफ बडी I बोली---
' 'मेरे जादूगर I. आज मैं तुम्हें एक ऐसा जादू दिखाती हूँ किं तुम जिन्दगी भर याद रखोगे । तुम का जैसा मैं कहुं बैसा ही करते जाओ I"
"ठीक है आज्ञा दो-क्या करना है?" इंद्रजीत ने दिलचस्पी दिखाई।
”पहले मै तुम्हारे हाथ पीछे करके इस बात से बाधूंगी । फिर टागो और उसके बाद तुम्हारे पूरे जिस्म पर इस बाल को बांध दुगी । "
इन्द्रजीत हस' दिया--"' 'देवी जी, आप भुल रही है कि यह घोडे की दुम का बाल है कोई रस्सी नहीं है। इससे तुम मेरे हाथ ही बांध सको तो यही बहुत है । ' '
' 'तुम तो बस मेरा कमाल देखते जाओ और मुझे दाद देते जाओ । लाओ, अपने हाथ लाओ । "
इन्द्रजीत ने अपने दोनों हाथ उसके सामने कर दिये।
"अपने हाथ पीछे करो... । ' ' बकाल ने कहा और फिर यूं उसके हाथ पीछे करके एक खास अंदाज में बांध दिये।
बैठ जाओ ।
"यह क्यों भ्रूल जाते हो कि उसने तुम्हारी जान बचाई थी। अगर उसने ऐसा न किया होता तो आजतुम कहां होते? "
' 'इसके लिए में उसका शुक्रगुजार था । मैंने उसकी बहुत सेवा की। उसका गुलाम बनकर रहा.. . ।"
“सेबा...?उसकी हत्या करवा के...।" ' ' वह विषाक्त लहजे में ब्रोली-' 'वाह I. क्या सेवा की है तुमने उसकी । ' '
“ आखिर तुम हो कौन? ' ' इन्द्रजीत असहाय-सा बोला।
' 'मेरे जादूगर । मै तुम्हारी सजा हूँ...एक खूबसूरत सजा...।” उस रूपसी ने अजीब-सा अदाज अपना लिया था । और जाने क्या था उसके स्वर में कि इंद्रजीत ने अपनी रगों में एक सर्द लहर दौड गई महसूस की।
उसने अपने सूख चले होठों पर जिव्हा फेरी और पूछा-"कहां से आई हो? ' '
"मुझे देवा काली ने भेजा है। ' '
"कौन देवा काली? "
"वहीँ देवा काली, जिसे राजूमदारी ने अपने अंतिम क्षणों में, अपनी सहायता के लिए पुकारा था तो उस समय मैं देवा काली क्रे चरणों में बैठी थी । राजूमदारी की पुकार सुनकर देवा काली ने मुझे इशारा किया। उसके आदेश पालन में में राजू मदारी की सहायता को गई। लेकिन समय बीत चुका था । मैं राजूमदारी को बचा नहीं सकी।। मरते हुए उसकी इच्छा थी कि उसकी मौत का प्रतिशोध लिया जाए कि उसके साथ धोखा करने वाले को बख्शा न जाए। सो तुमने सुन लिया कि मैने योगी दयाल की क्या दुर्गत बनाई । वो अपनी जान से गया। अब तुम्हारी बारी है । मैं तुम्हें मारूगी नहीं | इसलिए कि मै' स्वय तुम पर मर गई हूँ। अब तुम सिर्फ मेरे लिए जीवित रहोगे। मेरे होकर रहोगे, मेरी कैद मे रहोगे !"
"और अगर मैं तुम्हारी कैद में न रहना चाहूँ तो... । "
"बात तुम्हारे चाहने की नहीं है-मेरे चाहने की है। ' ' वह हसी', उसकी हसी' में व्यग्य' था।
“लेकिन मैं किसी और को चाहता हूं। उसी की कैद में रहना चाहता हू।" इन्द्रजीत नै अपने दिलं की कही।
" ~ अब भूल जाओ उसको।" वह इन्द्रजीत क्रो गहरी नजरो से देखते हुए बोली---"मैं जानती हूँ वो आ रही है I तुमने उसे रास्ता दिखाने के लिए अगनी कमीज राह में फैक दी है और वह स्वयं तुम्हें दूढते हुए अतत': इस चबूतरे तक पहुच जाएगी लेकिन उसके आते ही यहा कुछ नहीं रहेगा। ' '
”औह । अच्छा हुआ कि यह तो मालूम हो गया कि नयना आखिरकार यहां तक पहुच जाएगी। अब मैं यहां से नहीं हिंलूगा'। यहीं बैठा रहूगा। उसके आने की इंतजार करूगा... । ‘ ‘ इन्द्रजीत ने निर्णायक लहजे में कहा ।
' 'क्या चाहते हो...तुम्हारी नयना को अधा का दू ताकि वह यहा तक कभी पहुच ही न सके। " उस रूपसी ने यह बात बेहद सर्द और निर्मम लहजे में कही थी ।
"कोई खास अमल जानती हो क्या?'' इन्द्रजीत ने बिषय बदलते हुए पुछा ।
"इस जगत में एक नर्म आरामदायक कालीन पर बैठे हो। इसके बाद भी तुम्हे किसी अमल का सबूत चाहिये…।"
"मैं तुम्हारा नाम जान सक्ला हूँ?"
' 'मेरा नाम बकाल है । ’ '
"बकाल...यह क्या नाम हुआ भला।" इन्द्रजीत सचमुच ही उलझ गया था ।
”बकाल का अर्य है -रेगिस्तान की शहजादी। " उसने मुस्कराते हुए बताया-- ' 'क्या मैं तुम्हें बकाल दिखाई नहीं देती? रेगिस्तान की शहजादी नजर नहीं आती?"
इंद्रजीत उसको इस बात का क्या जवाब देता । वह निसन्देह ही एक बेहद सुन्दर आकर्षक युवती थी । एक सवप्न सुन्दरी। उस पर उठने वाली नजर मुश्किल से ही झुकती थी । अब वह मरुस्थल की शहजादी थी या पहाडों की मलिका थी यह इन्द्रजीत की समस्या नहीं थी। इन्द्रजीत की समस्या तो केवल यही थी कि नयना किसी भी तरह यहा तक पहुच जाये और उसको लेकर निकल जाए। इसी हालात ने इंद्रजीत की खोपडी घुमा दी थी ।। वह खुफजदा होने की हद तक चिन्तित हो उठा था ।
बकाल ने अब और अधिक समय नष्ट करना उचित न समझा। वह शीघ्र अतिशीघ्र अपनी कारवाई पूरी कर लेना चाहती थी । वह जानती थी कि नयना को यहा तक पहुचने में बहुत देर लगेगी । फिर भी वह खामखाह की उलझनों में नहीं पडना चाहती थी।
उसने इन्द्रजीत को मादक-नशीली निगाहों सै देखा। बेहद मनमोहक अंदाज में मुस्कराई और फिर शहद से मीठे लहजे मे बोली---
"इंद्र ! मेरा एक काम करो । "
"हां, बोलो… ।" इन्द्रजीत स्वय को निर्भय साबित करना चाहता था और इसमें वह काफी हद तक सफल भी नजर आ रहा था ।
"तुम्हारा घोडा कहा' है?" बकाल नै पूछा ।
"निकट ही है वह उधर उन पेडों के झुण्ड में है । " इन्द्र ने बताया ।
" जाओ, उसकी दुम का एक बाल ले आओ । " बकाल ने बडी, बिचित्र फरमाईश क्री।
"बाल…? क्या करोगी?" इन्द्र उछल ही तो पड़ा था।
"तुम तो बडे जादूगर हो-तुम्हें तो मालूम होगा । " उसने हंसकर कहा।
"नहीं मैं नहीं जानता। मैंने आज तक घोडे के बाल सै कोई चमत्कार नहीं दिखाया।”
"अच्छा, फिर जाओ, लेकर आओं । मैं आज तुम्हें एक जबरदस्त तमाशा दिखाती हूँ अगर पंसद आया और तुम सीखना चाहोगे तो तुम्हें सिखा भी दुगो' । " बकाल ने उसे अपनी चमकती-प्यासी आखो सै देखते हुए कहा ।
“इन्द्रजीत चबूतरे से उतर गया। वह उन पेडों के झुण्ड की तरफ बड़ गया, जहा उसका घोडा, खडा था। वह घोडे के निकट पहुंचा तो उसके दिमाग में एक छन्नाका-सा हुआ। उसने सोचा कि क्यो न मोके का फायदा उठाए और घोडे पर सवार होका निकल ले । यह बकाल उसका कुछ न कर सकेगी-बस देखती ही रहेगी । पर फिर यह ख्याल भी आया कि अगर वह यहा से निक्ल गया तो नयना को केसे पाएगा । जब तक कि वह जगल सै बाहर निक्लेगा, तब तक तो नयना यहा' पहुच जाएगी । फिर यह मायावी बकाल उसे भला कहा छोडेशी । फिर यह जाने नयना की क्या हालत करे, हो सकता है उसे अंधा ही बना दे। हां अभी उसे कुछ देर सब्र करना चाहिये। उसे देखना चाहिये कि वह घोड़े के बाल का क्या करती हे? कैसा तमाश दिखाना चाहती हे I हो सकता है तब तक नयना उसे तलाश करते हुए यहां तक पहुच जाए ।
नयना के ख्याल से इन्द्रजीत के दिल में दुस्साहस दिखाने का ख्याल निक्ल गया।
इन्द्रजीत ने यह भी सोचा कि नयना के साथ मिलकर वह शायद इस बकाल की बच्ची को ठिकाने लगा सके। इन्द्रजीत घोडे की दुम का बाल तोड बापस बकाल के पास पहुचा' I
"यह लो ।" बाल, बकाल के सामनें लहराते हुए बोला था वह॥॥
बकाल ने बाल ले लिया फिर दोनों हाथों से पकडकर खींचकर देखा। खासा लम्बा और मजबूत बाल था। वह बाल थामे इन्द्रजीते की तरफ बडी I बोली---
' 'मेरे जादूगर I. आज मैं तुम्हें एक ऐसा जादू दिखाती हूँ किं तुम जिन्दगी भर याद रखोगे । तुम का जैसा मैं कहुं बैसा ही करते जाओ I"
"ठीक है आज्ञा दो-क्या करना है?" इंद्रजीत ने दिलचस्पी दिखाई।
”पहले मै तुम्हारे हाथ पीछे करके इस बात से बाधूंगी । फिर टागो और उसके बाद तुम्हारे पूरे जिस्म पर इस बाल को बांध दुगी । "
इन्द्रजीत हस' दिया--"' 'देवी जी, आप भुल रही है कि यह घोडे की दुम का बाल है कोई रस्सी नहीं है। इससे तुम मेरे हाथ ही बांध सको तो यही बहुत है । ' '
' 'तुम तो बस मेरा कमाल देखते जाओ और मुझे दाद देते जाओ । लाओ, अपने हाथ लाओ । "
इन्द्रजीत ने अपने दोनों हाथ उसके सामने कर दिये।
"अपने हाथ पीछे करो... । ' ' बकाल ने कहा और फिर यूं उसके हाथ पीछे करके एक खास अंदाज में बांध दिये।
बैठ जाओ ।