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रेखा बाहर निक्ली तो उसने झोपडी के सामने एक सजी सजाई ऊठनी' को पाया, जो बैठी हुई थी।
बकाल ने उसे उस ऊठनी पर सवार कर दिया और खुद निकट खडे घोडे पर बैठ गई। बकाल के पीछे आठ सशस्त्र घुडसवार¸ मौजूद थे, बकाल के इशारे पर दो घुडसवार. आगे आए ऊठनी के आगे ख़ड़े हो गए। दो घुड़सबार ऊठनी के पीछे और उनके पीछे बकाल और शेष चारों घुडसवार ।
तब' अकाल ने कूच का इशारा किया। दो घुडसवारों ने अजीब-सी आवाज निकाली। वह ऊठनी ऊठकर खडी हो गई । .
और फिर यूं अगले ही क्षण बकाल का यह छोटा-सा काफिला दक्षिण दिशा की तरफ घूल उड़ाता हुआ रवाना हो गया ।
तीन घन्टे के फासले के बाद, जब सूर्यं पश्चिम में झुकने लगा, सामने किसी इमारत के आसार नजर आए। यह किसी प्राचीन भबन के खण्डहर थे। खण्डहर, सूरज की पीली रोशनी में इन खण्डहरों का रग' और भी चमक उठा था ।
फिर वे लोग इन खण्डहरों में प्रवेश कर गये । इन खण्डहरों के बीच एक रास्ता अन्दर को जाता था. रास्ता तग' था, लेकिन इतना तग नहीं था कि दो साथ न गुजर सकें।
ये बड़े अजीब से खण्डहर थै। ऊँची नीची दीवारें थीं । इन दीवारों के बीच अदर' दाखिल होने को बिना 'पट' के दरवाजे थे । ये दीवारें न तो टूटी-फूटी थी और न ही यह अहसास होता था कि यह कोई विधिवत भवन है।
यह छोटा सा काफिला इन खण्डहरों के बीच घूमता घामता काफी अन्दर तक चला गया ।
तब अचानक ही एक बड़ा सा दरवाजा नजर आया। यह विशाल फ्रंटनूमा दरवाजा बन्द था, अगले दो धूडसबारो ने दरवाजे के सामने खडे होकर चीखकर कहा---
"दरवाजा खोलो बकाल की सवारी आई है । ' '
यह आवाज सुनले ही छ: आदमी दरवाजे की दाहिनी दिशा में बनी कोठरी से निक्ले और छ: आदमी बाईं तरफ की कोठरी सै बाहर आए और उन सबने मिलकर उस विशाल भारी दरवाजे को खोला।
दरवाजा खुलते ही सारे घुडसवार घोडों से उतर गए। रेखा को ऊठनी सै उतारा गया। बकाल भी अपने घोडे से कूद आई थी । जेसे ही रेखा ऊठनी से नीचे उतरी, जकाल ने उसका हाथ थाम लिया और वे दोनों दरवाजे के अन्दर दाखिल हो गई । उनके भीतर जाते ही उन बारह आदमियों ने मिलकर पट बन्द कर दिये और अपनी कोठरियों में वापस चले गए । फाटक के दूसरी तरफ सामने ही सीढिया थीं।
दरवाजा बन्द होते ही बकाल ने सीढिया चढना शुरू की। सीढिया चढते चढते, रेखा को ऊपर एक दरवाजा नजर आया । इस दरवाजे पर एक हथियारबद दरबान मौजूद था। वह बकाल को देखकर उसके सम्मान में कमर के बल झुका, फिर सीधा होकर बोला---"क्या आदेश है, बकाल ।।' '
"राकल से मिलना चाहती हूँ। उसकी अमानत उसे सौंपने आई हूँ.. । ' '
' 'अच्छा, ठहरो । ' ' दरवान ने आगे बढकर, बद दरवाजे पर लगी जजीर को एक विशिष्ट अदाज में बजाया। कुछ ही क्षणों में दरवाजे में एक छोटी खिड़की खुली ओर उसमें से एक शख्स ने अपना मुह चमकाया, बोला--
"हा क्या कहते हो? "
“राकल को सुचना दो, बकाल आईं हे...साथ ही उसकी आमानत भी साथ लाइ है। " दरबान ने बताया।
"ठीक है । ' ' कहते हुए उस शख्स ने खिडकी बन्द कर ली ।
कुछ देर बाद दरवाजा खुला। रेखा क्रो दुसरी तरफ एक बहुत बड़ा उल्लू नजर आया जो सामने के चबूतरे पर अपनी एक टाग पर खड़ा था और उसने अपनी एक आख बन्द कर रखी थी। बराबर में एक बहुत बड़ा स्तून था ।
बकाल रेखा का हाथ थामे अदर दाखिल हुई और उस चबूतरे के निकट पहुचकर रूक गई। उसने सिर उठाया और उस एक टाग वाले उल्लू के सामने आदर से सिर नवाया। उसने रेखा को भी झुकने का इशारा किया था-लेकिन रेखा सीधी खडी रही । तब उस विशालकाय उल्लू ने अपनी आख खोल दी और अपनी दोनों आखो से पहले वकाल और फिर रेखा को देखा ।
"राकल, मेरे भाई! तेरी अमानत ले आई हूँ…इसे कबूल कर । " बकाल ने बडे आदर से कहा।
उस उल्लू ने अपनी एक टाग पर खड़े-खड़े ही अपने दोनों पख खोलकर फडफडाए । उसके पंख इतने बडे थे कि उनके हिलने से रेखा और बकाल को अपने चेहरों पर हवा के थपेडों का अहसास हुआ।
उसके पंख फडफडाने.. का मतलब यह था कि उसने रेखा को कबूल कर लिया है।
' 'मैं तेरी शुक्र गुजार हू मेरे भाई। ” बकाल फिर सम्मानपूर्ण लहजे में झुकी।
तभी बराबर वाले विशाल स्तम्भ के पीछे से एक के बाद दुसरी औरत निकलती नजर आई ।
वे सात औरतें थीं । चिताकर्षक सफेद रंगत गोल खूबसूरत चेहरे, एक जेसे छोटे कद, एक जेसा सुर्ख रग' का लिबासा शायद उनके चेहरे भी एक जेसे हो थे। अगर कोई अतर था भी दो वह एक नजर देखने में महसूस नहीं होता था ।
वे औरतें, पक्तिबद्ध' चलती हुई, उस विशालकाय उल्लू के पीछे से घुमती, सीढिया उतराकर रेखा के गिर्द घेरा डालकर खडी. हो गई ।
फिर इन सात औरतों में सै दो ने रेखा के हाथ पकड लिए । तीसरी औरत ने उसे पीठ से कोमलता से आगे धकेला। वे दोनो औरतें रेखा के हाथ थामे आगे चलने लगीं। शेष पांच उसके पीछे चल दीं।
वे सीढिया चढकर उस उल्लू के पीछे आई और वहां से बढ़कर स्तम्भ की ओट में चली गई । रेखा ने देखा कि इस स्तम्भ के पीछे की तरफ एक दरवाजा था जो नीचे से नजर नहीं आता था । इस दरवाजे में से सीढियां नजर आ रही थीं, जो नीचे की तरफ चली गई थीं ।
वे दोनों औरतें रेखा का हाथ पकडे नीचे उतरने लगीं।
रेखा के चले जाने के बाद बकाल, राकल से मुखातिब होकर बोली--- " राकल, मेरे भाई! मुझे तुमसे कुछ बात करनी है । "
बकाल की बात सुनकर उस विशालकाय, खौफ़नाक उल्लू ने उसे घूरकर देखा फिर अपनी एक आख बद कर ली...ओर साकत हो गया।
बकाल ने महसूस कर लिया कि, राकल अब यहां नहीं है। सो वह भी सीढियां चढकर. स्तम्भ के पीछे पहुची और दरवाजे में प्रवेश करके तेजी से सीढिया उतरने लगी ।
यह एक बहुत बड़ा तहखाना था-ज़हां जगह जगह रोशनी हो रही थी।। तहखाने में दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था । वे औरते रेखा को अपने ठिकाने पर ले जा चुकी थी।
बकाल सीढिया उतराकर आगे बड्री तो उसे गोल चेहरे बाली एक सेविका दिखाई दी I तो एकाएक ही कही से प्रकट हुईं थी । बह बकाल को देख, उसके सामने आदर सै सिर नवाकर खडी. हो गई।
"राकल कहां है? " बकाल ने उसके निक्ट पहुचकर पूछा I
उस सेविका ने मुह' से कुछ कहने की बजाय एक तरफ इशारा किया । बकाल उसके पीछे-पीछे चलने लगी । यूं बह्र विभित्र दरवाजों के सामने से हुई, एक बड़े से दरवाजे के सामने आकर रूक गई । और जब बक्राल भी इस दरवाजे के सामने पहुच' गई तो वह सेविका उल्टे कदमों लौट गई।
बकाल ने दरवाजे पर हाथ रखा तो वह फोरन खुल गया । वह बेघडक दरवाजे में प्रदेश कर गई। अन्दर आक्रर उसने… पलटकर दरवाजा बन्द किया और आगे बढ़ी।
दरवाजे से कुछ ही कदम के फासले पर एक पर्दा लटक रहा था। वह पर्दा ह्रटाकर दूसरी तरफ पहुची तो उसने देखा कि कमरे के ठीक बीर्चों-बीच एक ऊची मसन्द पर राकल शोख रग शाही लिबास पहने बैठा है ।
कमरे में सुर्ख रग का मोटा कालीन बिछा हुआ था और कमरा भरपूर रोशनी में जगमगा रहा था I
राकल-सिह्रासननुमा मसद पर किसी राजा की तरह बैठा हुआ था। उसके गले में मोतियों का कीमती हार पडा हुआ था । घुंघराले बाल, सुर्खी लिए सावली रंगत, बलिष्ट, स्वस्थ बदन और एक हाथ में साप कीं तरह बल खाया हुआ राज़-दण्ड।
वह बकाल को 'देखकर मुस्कराया बकाल उसे देखकर. मुस्कराई और उसके चरणों में बैठ गई ।
' 'बो कहा है, मेरे भाई?" ' बकाल ने पूंछा I
”कौन रेखा? '' राकल ने जानना चाहा I
" नहीं, वह चमगादड़ का बच्चा॥ ' ' बकाल बिफर गई ।।
राकल ने यह सुनकर एक गगनभेदी कहकहा लगाया, फिर बोला--' 'तूने उसका नाम खूब रखा है, बकाल। ' '
' 'वह है कहां । "
“हमारी कैद में… I " राकल ने बताया
”बैसे बकाल तूने उसके साथ बड़ा जुल्म किया है? "
' 'मेरे भाई, क्या तुम चाहते हो कि में उस चमगादढ़ के बच्चे के साथ शादी कर लूँ? ''
' 'यह मैंने कब कहा । देवा काली की कसम बो है तेरा सच्चा आशिक।" राकल बौला--"सच तो यह है कि मुझे उस पर रहम आता है।"
"यह राकल को रहम कब से आने लगा । " राकल ने व्यग्य कसा ।।
' 'खैर छोड, यह बता तू यहां मुझसे क्या बात करने आई थी? ' ' राकल ने विषय बदलत्ते हुए पूछा।
बकाल ने उसे उस ऊठनी पर सवार कर दिया और खुद निकट खडे घोडे पर बैठ गई। बकाल के पीछे आठ सशस्त्र घुडसवार¸ मौजूद थे, बकाल के इशारे पर दो घुडसवार. आगे आए ऊठनी के आगे ख़ड़े हो गए। दो घुड़सबार ऊठनी के पीछे और उनके पीछे बकाल और शेष चारों घुडसवार ।
तब' अकाल ने कूच का इशारा किया। दो घुडसवारों ने अजीब-सी आवाज निकाली। वह ऊठनी ऊठकर खडी हो गई । .
और फिर यूं अगले ही क्षण बकाल का यह छोटा-सा काफिला दक्षिण दिशा की तरफ घूल उड़ाता हुआ रवाना हो गया ।
तीन घन्टे के फासले के बाद, जब सूर्यं पश्चिम में झुकने लगा, सामने किसी इमारत के आसार नजर आए। यह किसी प्राचीन भबन के खण्डहर थे। खण्डहर, सूरज की पीली रोशनी में इन खण्डहरों का रग' और भी चमक उठा था ।
फिर वे लोग इन खण्डहरों में प्रवेश कर गये । इन खण्डहरों के बीच एक रास्ता अन्दर को जाता था. रास्ता तग' था, लेकिन इतना तग नहीं था कि दो साथ न गुजर सकें।
ये बड़े अजीब से खण्डहर थै। ऊँची नीची दीवारें थीं । इन दीवारों के बीच अदर' दाखिल होने को बिना 'पट' के दरवाजे थे । ये दीवारें न तो टूटी-फूटी थी और न ही यह अहसास होता था कि यह कोई विधिवत भवन है।
यह छोटा सा काफिला इन खण्डहरों के बीच घूमता घामता काफी अन्दर तक चला गया ।
तब अचानक ही एक बड़ा सा दरवाजा नजर आया। यह विशाल फ्रंटनूमा दरवाजा बन्द था, अगले दो धूडसबारो ने दरवाजे के सामने खडे होकर चीखकर कहा---
"दरवाजा खोलो बकाल की सवारी आई है । ' '
यह आवाज सुनले ही छ: आदमी दरवाजे की दाहिनी दिशा में बनी कोठरी से निक्ले और छ: आदमी बाईं तरफ की कोठरी सै बाहर आए और उन सबने मिलकर उस विशाल भारी दरवाजे को खोला।
दरवाजा खुलते ही सारे घुडसवार घोडों से उतर गए। रेखा को ऊठनी सै उतारा गया। बकाल भी अपने घोडे से कूद आई थी । जेसे ही रेखा ऊठनी से नीचे उतरी, जकाल ने उसका हाथ थाम लिया और वे दोनों दरवाजे के अन्दर दाखिल हो गई । उनके भीतर जाते ही उन बारह आदमियों ने मिलकर पट बन्द कर दिये और अपनी कोठरियों में वापस चले गए । फाटक के दूसरी तरफ सामने ही सीढिया थीं।
दरवाजा बन्द होते ही बकाल ने सीढिया चढना शुरू की। सीढिया चढते चढते, रेखा को ऊपर एक दरवाजा नजर आया । इस दरवाजे पर एक हथियारबद दरबान मौजूद था। वह बकाल को देखकर उसके सम्मान में कमर के बल झुका, फिर सीधा होकर बोला---"क्या आदेश है, बकाल ।।' '
"राकल से मिलना चाहती हूँ। उसकी अमानत उसे सौंपने आई हूँ.. । ' '
' 'अच्छा, ठहरो । ' ' दरवान ने आगे बढकर, बद दरवाजे पर लगी जजीर को एक विशिष्ट अदाज में बजाया। कुछ ही क्षणों में दरवाजे में एक छोटी खिड़की खुली ओर उसमें से एक शख्स ने अपना मुह चमकाया, बोला--
"हा क्या कहते हो? "
“राकल को सुचना दो, बकाल आईं हे...साथ ही उसकी आमानत भी साथ लाइ है। " दरबान ने बताया।
"ठीक है । ' ' कहते हुए उस शख्स ने खिडकी बन्द कर ली ।
कुछ देर बाद दरवाजा खुला। रेखा क्रो दुसरी तरफ एक बहुत बड़ा उल्लू नजर आया जो सामने के चबूतरे पर अपनी एक टाग पर खड़ा था और उसने अपनी एक आख बन्द कर रखी थी। बराबर में एक बहुत बड़ा स्तून था ।
बकाल रेखा का हाथ थामे अदर दाखिल हुई और उस चबूतरे के निकट पहुचकर रूक गई। उसने सिर उठाया और उस एक टाग वाले उल्लू के सामने आदर से सिर नवाया। उसने रेखा को भी झुकने का इशारा किया था-लेकिन रेखा सीधी खडी रही । तब उस विशालकाय उल्लू ने अपनी आख खोल दी और अपनी दोनों आखो से पहले वकाल और फिर रेखा को देखा ।
"राकल, मेरे भाई! तेरी अमानत ले आई हूँ…इसे कबूल कर । " बकाल ने बडे आदर से कहा।
उस उल्लू ने अपनी एक टाग पर खड़े-खड़े ही अपने दोनों पख खोलकर फडफडाए । उसके पंख इतने बडे थे कि उनके हिलने से रेखा और बकाल को अपने चेहरों पर हवा के थपेडों का अहसास हुआ।
उसके पंख फडफडाने.. का मतलब यह था कि उसने रेखा को कबूल कर लिया है।
' 'मैं तेरी शुक्र गुजार हू मेरे भाई। ” बकाल फिर सम्मानपूर्ण लहजे में झुकी।
तभी बराबर वाले विशाल स्तम्भ के पीछे से एक के बाद दुसरी औरत निकलती नजर आई ।
वे सात औरतें थीं । चिताकर्षक सफेद रंगत गोल खूबसूरत चेहरे, एक जेसे छोटे कद, एक जेसा सुर्ख रग' का लिबासा शायद उनके चेहरे भी एक जेसे हो थे। अगर कोई अतर था भी दो वह एक नजर देखने में महसूस नहीं होता था ।
वे औरतें, पक्तिबद्ध' चलती हुई, उस विशालकाय उल्लू के पीछे से घुमती, सीढिया उतराकर रेखा के गिर्द घेरा डालकर खडी. हो गई ।
फिर इन सात औरतों में सै दो ने रेखा के हाथ पकड लिए । तीसरी औरत ने उसे पीठ से कोमलता से आगे धकेला। वे दोनो औरतें रेखा के हाथ थामे आगे चलने लगीं। शेष पांच उसके पीछे चल दीं।
वे सीढिया चढकर उस उल्लू के पीछे आई और वहां से बढ़कर स्तम्भ की ओट में चली गई । रेखा ने देखा कि इस स्तम्भ के पीछे की तरफ एक दरवाजा था जो नीचे से नजर नहीं आता था । इस दरवाजे में से सीढियां नजर आ रही थीं, जो नीचे की तरफ चली गई थीं ।
वे दोनों औरतें रेखा का हाथ पकडे नीचे उतरने लगीं।
रेखा के चले जाने के बाद बकाल, राकल से मुखातिब होकर बोली--- " राकल, मेरे भाई! मुझे तुमसे कुछ बात करनी है । "
बकाल की बात सुनकर उस विशालकाय, खौफ़नाक उल्लू ने उसे घूरकर देखा फिर अपनी एक आख बद कर ली...ओर साकत हो गया।
बकाल ने महसूस कर लिया कि, राकल अब यहां नहीं है। सो वह भी सीढियां चढकर. स्तम्भ के पीछे पहुची और दरवाजे में प्रवेश करके तेजी से सीढिया उतरने लगी ।
यह एक बहुत बड़ा तहखाना था-ज़हां जगह जगह रोशनी हो रही थी।। तहखाने में दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था । वे औरते रेखा को अपने ठिकाने पर ले जा चुकी थी।
बकाल सीढिया उतराकर आगे बड्री तो उसे गोल चेहरे बाली एक सेविका दिखाई दी I तो एकाएक ही कही से प्रकट हुईं थी । बह बकाल को देख, उसके सामने आदर सै सिर नवाकर खडी. हो गई।
"राकल कहां है? " बकाल ने उसके निक्ट पहुचकर पूछा I
उस सेविका ने मुह' से कुछ कहने की बजाय एक तरफ इशारा किया । बकाल उसके पीछे-पीछे चलने लगी । यूं बह्र विभित्र दरवाजों के सामने से हुई, एक बड़े से दरवाजे के सामने आकर रूक गई । और जब बक्राल भी इस दरवाजे के सामने पहुच' गई तो वह सेविका उल्टे कदमों लौट गई।
बकाल ने दरवाजे पर हाथ रखा तो वह फोरन खुल गया । वह बेघडक दरवाजे में प्रदेश कर गई। अन्दर आक्रर उसने… पलटकर दरवाजा बन्द किया और आगे बढ़ी।
दरवाजे से कुछ ही कदम के फासले पर एक पर्दा लटक रहा था। वह पर्दा ह्रटाकर दूसरी तरफ पहुची तो उसने देखा कि कमरे के ठीक बीर्चों-बीच एक ऊची मसन्द पर राकल शोख रग शाही लिबास पहने बैठा है ।
कमरे में सुर्ख रग का मोटा कालीन बिछा हुआ था और कमरा भरपूर रोशनी में जगमगा रहा था I
राकल-सिह्रासननुमा मसद पर किसी राजा की तरह बैठा हुआ था। उसके गले में मोतियों का कीमती हार पडा हुआ था । घुंघराले बाल, सुर्खी लिए सावली रंगत, बलिष्ट, स्वस्थ बदन और एक हाथ में साप कीं तरह बल खाया हुआ राज़-दण्ड।
वह बकाल को 'देखकर मुस्कराया बकाल उसे देखकर. मुस्कराई और उसके चरणों में बैठ गई ।
' 'बो कहा है, मेरे भाई?" ' बकाल ने पूंछा I
”कौन रेखा? '' राकल ने जानना चाहा I
" नहीं, वह चमगादड़ का बच्चा॥ ' ' बकाल बिफर गई ।।
राकल ने यह सुनकर एक गगनभेदी कहकहा लगाया, फिर बोला--' 'तूने उसका नाम खूब रखा है, बकाल। ' '
' 'वह है कहां । "
“हमारी कैद में… I " राकल ने बताया
”बैसे बकाल तूने उसके साथ बड़ा जुल्म किया है? "
' 'मेरे भाई, क्या तुम चाहते हो कि में उस चमगादढ़ के बच्चे के साथ शादी कर लूँ? ''
' 'यह मैंने कब कहा । देवा काली की कसम बो है तेरा सच्चा आशिक।" राकल बौला--"सच तो यह है कि मुझे उस पर रहम आता है।"
"यह राकल को रहम कब से आने लगा । " राकल ने व्यग्य कसा ।।
' 'खैर छोड, यह बता तू यहां मुझसे क्या बात करने आई थी? ' ' राकल ने विषय बदलत्ते हुए पूछा।