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इन्द्रजीत्त अन्दर आया तो वह अन्दाजा नहीं लगा पाया कि राकल ने उल्लू कीं लाश के साथ क्या किया है । राकल ने मृत उल्लू र्की तरफ इशारा करते हुए कहा ।
"इसे बाहर ले जा । रेत खोदकर गाड दे ।"
इन्द्रजीत्त अन्दर आया तो वह अन्दाजा नहीं लगा पाया कि राकल ने उल्लू कीं लाश के साथ क्या किया है । राकल ने मृत उल्लू र्की तरफ इशारा करते हुए कहा ।
"इसे बाहर ले जा । रेत खोदकर गाड दे ।"
"मेरे पास यहा खोदने को कुछ भी नहीं है। "
"अपने हाथों से रेत हटाकर, छोटा-सा गड़ा वना और फिर इसे रेत से ढक दे। “
इन्द्रजीत ने ऐसा ही किया l बाहर ले जाकर उसने उल्लू को रेत में दबा दिया और हाथ झांड़ता हुआ उठ खड़ा हुआ।
इन्द्रजीत वापिस झोंपडी में पहुचा तो वह यह देखकर हैरान रह गया कि राकल के घाव तेजी सै भर रहे थे और फिर कोई आधे घण्टे में ही वो पूर्णतया स्वस्थ व सामान्य हो गया। वह वहुत खुश था और उठकर बैठ गया था।
राकल को खुश देखकर इन्द्र वोला---"देख राकल मैने तेरे साथ दुश्मनों का सा सलूक नहीं किया।“
"मै मानता हूं। " राकल उसका आभारी था।
"फिर मुझे सच-सच क्यों नहीं बता देता?”
"किस बारे में? "
"रेखा के बारे मैं । मेरी बहन के बारे में। मुझे बता दे कि वह कहां है?”
"आह । " रेखा का नाम सुनकर राकल ने एक सर्द आह भरो और खाली-खाली नजरों से इन्द्र को देखने लगा ।
उसकी समझ मॅ नहीं आ रहा था कि इन्द्र को क्या जवाब दे। उसने सिर झुका लिया । इंद्रजीत जवाब का प्रतीक्षक था, पर जब राकल काफी देर तक कुछ नहीं बोला तो इन्द्र ने उसे पुकारा---"राकल ।"
राकल ने अपना सिर उठाया, फिर धीरे सै बोला-- "जो होना था, हो चुका। अब कुछ नहीं हो सकता ।”
इन्द्र को उसके जवाब पर हैरत हुई। वह कुछ समझ ही नहीं पाया था। यह उसके सवाल का जवाब भी तो नहीं था। इन्द्र क्रो लगा जेसे राकल उसै सही जवाब नहीं देना चाहता, सो उसने भी आगे कोई सवाल नहीं किया।
एक लम्बी खामोशी के बाद राकल ही बोला था-- ”इन्द्रजीत, क्या यह मुमकिन है कि तू कुछ देर के लिए झोपडी. से बाहर चला जाए । "
"हा , क्यों नहीं?" इन्द्र खडे होते हुए बोला-- "लेकिन बात क्या है?"
"जव तू थोडी. देर बाद वापिस आयेगा तो सब कुछ जान लेगा।" राकल ने जवाब दिया ।
इंद्रजीत उसके कहने पर झोपडी. से बाहर चला गया I वह घूमकर झोपडी के पीछे चला गया और फिर कुछ देर वहां _खडे रहने के बाद जब वापिस आया और झोपडी मे कदम रखा तो हैरान रह गया।
लगडा राकल झोपडी. में मोजूद नहीं था।
इन्द्र फ्तटका झोंपडी, से बाहर आया। उसने चारों तरफ नजर दौडाई., लेकिन उसे राकल कही जाता हुआ भी नजर नहीं आया । हां, एक उल्लू जरूर उडता. हुआ दक्षिण दिशा में जाता नजर आया था।
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राकल इन्द्रजीत को धोखा देकर निकल गया था , लेकिन वह इस बात से बेख़बर था कि खुद उसकी किस्मत ने उसके साथ कितना बड़ा फरेब किया था। उस पर कितनी बडी चोट लगाई थी I
और यह बात उसे सुनहरे खण्डहर पहुचकर मालूम हुई। वहां का नक्शा ही बदला हुआ था । सरदार कोलाना ने सुनहरे खण्डहर की ईट से ईंट बजा दी थी। अब यहा कुछ न बचा था। हर चीज तबाह हो गई थी। हर तरफ तबाही फैली हुई थी और सरदार कोलाबा के हरकारे राकल की धात में बैठे थे।
सुनहरे खण्डहरों मॅ जब वह अच्छी तरह घूम लिया और उसने अपनी बर्बादी के निशान हर तरफ देख लिए तो कोलाना के हरकारे उसके सामने आ गए। अपने महल व अपने इस मायालोकं की बर्बादी देखकर राकल पहले ही अधमरा हो रहा था सरदार कोलाबा की हरकर्तों को देखकर उसके होश ही उड गये।
सरदार कोलाबा के हरकारों ने उसे देखते-ही-देखते जजीरों मे जकड़ लिया और फिर जिस तरह काले चिराग को लै जाया गया था-बैसै ही राकल को ले जाया गया और उसे सरदार कोलाबा के सामने ले जाकर डाल दिया गया।
सरदार कोलाना ने अपने लम्बे वालों पर हाथ फेरा और मुस्कराते हुए बोला-- "आओ, फरेबी! "
"सरदार कोलाबा देवा काली की कसम मैने कोई फरेब नहीं दिया । "
"देख़, देवा काली की अगर झूठी कसम खाएगा तो में तुझे छोडूंगा' नहीं। अभी खत्म कर दूगा'।"
“में सच कहता हूं सरदार । मैंने तुझसे जो वायदा किया था वह मैं हर कीमत पर पूरा करता। मै सूरज निकलते ही काला चिराग क्रो लैकर यहां पहुच जाता, लेकिन 'मुक्ति द्वार' पर बेशुमार भेडियों, ने मुझ पर हमला कर दिया और मुझे घसीटते हुए ले गये। रास्ते में मैं जख्मी कीं पीड़ा बर्दाश्त न कर सका और बेहोश हो गया और जब मुझे होश आया तो बहुत देर हो चुकी थी । अब सरदार तू ही बता कि इसमे मेरा क्या कसूर है?"
“तेरे बारे में काला चिराग सही कहता है कि तू बड़ा 'ख़ब्बीस' है I तूने वाकई बढी… शानदार कहानी गढी, है और ऊपर से देवा काली की कसम भी खा ली है । "
"मैं सच कहता हूं सरदारा तू मेरा यकीन क्यों नहीं करता?"
”चल, कहता होगा तू सच । अब में क्या… कहूँ । तू वक्त पर नहीं पहुचा', लिहाज वो हो गया जो होना चाहिये था।”
"तुने मुझे कही का न छोड़ा-विल्कुत्त तबाह कर दिया । " राकल ने जेसे प्रलाप किया।
”तू जानता है कि काला चिराग हमारा कितना खास और महत्त्वपूर्ण आदमी है। तूने उसे क्या सोचकर कैद किया?”
"वस सरदार I गलती हो गई मुझसे । मुझे माफ कर दे । " राकल दीन भाव से बोला ।
" माफी। " सरदार कोलाना ने एक पैशाचिक कहकहा लगाया--”जरूर! ! पर तुझे सिर्फ एक ही सूरत में माफी मिल सकती है । "
"वह क्या? "
"तुझे वकाल से हाथ धोने पडेगी। "
"क्या तुझे वह पसन्द आ गई है? क्या तू उससे शादी करना चाहता है, सरदार? " राकल ने तेजी से पूछा I इस पर सरदार कोलाना ने फिर एक जोरदार कहकहा लगाया, फिर बोला--"अहमक I "
राकल ने उसे उलझी उलझी निगाह से देखा--”में समझ नहीं। "
"तू समझेगा भी नहीं । मैंने तुझे अहमक यूं ही नहीं कह दिया । अरे बेवकूफ वह काले चिराग की मुहब्बत है । तुझे बकाल को उसके लिए छोडना होगा ।"
"इसे बाहर ले जा । रेत खोदकर गाड दे ।"
इन्द्रजीत्त अन्दर आया तो वह अन्दाजा नहीं लगा पाया कि राकल ने उल्लू कीं लाश के साथ क्या किया है । राकल ने मृत उल्लू र्की तरफ इशारा करते हुए कहा ।
"इसे बाहर ले जा । रेत खोदकर गाड दे ।"
"मेरे पास यहा खोदने को कुछ भी नहीं है। "
"अपने हाथों से रेत हटाकर, छोटा-सा गड़ा वना और फिर इसे रेत से ढक दे। “
इन्द्रजीत ने ऐसा ही किया l बाहर ले जाकर उसने उल्लू को रेत में दबा दिया और हाथ झांड़ता हुआ उठ खड़ा हुआ।
इन्द्रजीत वापिस झोंपडी में पहुचा तो वह यह देखकर हैरान रह गया कि राकल के घाव तेजी सै भर रहे थे और फिर कोई आधे घण्टे में ही वो पूर्णतया स्वस्थ व सामान्य हो गया। वह वहुत खुश था और उठकर बैठ गया था।
राकल को खुश देखकर इन्द्र वोला---"देख राकल मैने तेरे साथ दुश्मनों का सा सलूक नहीं किया।“
"मै मानता हूं। " राकल उसका आभारी था।
"फिर मुझे सच-सच क्यों नहीं बता देता?”
"किस बारे में? "
"रेखा के बारे मैं । मेरी बहन के बारे में। मुझे बता दे कि वह कहां है?”
"आह । " रेखा का नाम सुनकर राकल ने एक सर्द आह भरो और खाली-खाली नजरों से इन्द्र को देखने लगा ।
उसकी समझ मॅ नहीं आ रहा था कि इन्द्र को क्या जवाब दे। उसने सिर झुका लिया । इंद्रजीत जवाब का प्रतीक्षक था, पर जब राकल काफी देर तक कुछ नहीं बोला तो इन्द्र ने उसे पुकारा---"राकल ।"
राकल ने अपना सिर उठाया, फिर धीरे सै बोला-- "जो होना था, हो चुका। अब कुछ नहीं हो सकता ।”
इन्द्र को उसके जवाब पर हैरत हुई। वह कुछ समझ ही नहीं पाया था। यह उसके सवाल का जवाब भी तो नहीं था। इन्द्र क्रो लगा जेसे राकल उसै सही जवाब नहीं देना चाहता, सो उसने भी आगे कोई सवाल नहीं किया।
एक लम्बी खामोशी के बाद राकल ही बोला था-- ”इन्द्रजीत, क्या यह मुमकिन है कि तू कुछ देर के लिए झोपडी. से बाहर चला जाए । "
"हा , क्यों नहीं?" इन्द्र खडे होते हुए बोला-- "लेकिन बात क्या है?"
"जव तू थोडी. देर बाद वापिस आयेगा तो सब कुछ जान लेगा।" राकल ने जवाब दिया ।
इंद्रजीत उसके कहने पर झोपडी. से बाहर चला गया I वह घूमकर झोपडी के पीछे चला गया और फिर कुछ देर वहां _खडे रहने के बाद जब वापिस आया और झोपडी मे कदम रखा तो हैरान रह गया।
लगडा राकल झोपडी. में मोजूद नहीं था।
इन्द्र फ्तटका झोंपडी, से बाहर आया। उसने चारों तरफ नजर दौडाई., लेकिन उसे राकल कही जाता हुआ भी नजर नहीं आया । हां, एक उल्लू जरूर उडता. हुआ दक्षिण दिशा में जाता नजर आया था।
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राकल इन्द्रजीत को धोखा देकर निकल गया था , लेकिन वह इस बात से बेख़बर था कि खुद उसकी किस्मत ने उसके साथ कितना बड़ा फरेब किया था। उस पर कितनी बडी चोट लगाई थी I
और यह बात उसे सुनहरे खण्डहर पहुचकर मालूम हुई। वहां का नक्शा ही बदला हुआ था । सरदार कोलाना ने सुनहरे खण्डहर की ईट से ईंट बजा दी थी। अब यहा कुछ न बचा था। हर चीज तबाह हो गई थी। हर तरफ तबाही फैली हुई थी और सरदार कोलाबा के हरकारे राकल की धात में बैठे थे।
सुनहरे खण्डहरों मॅ जब वह अच्छी तरह घूम लिया और उसने अपनी बर्बादी के निशान हर तरफ देख लिए तो कोलाना के हरकारे उसके सामने आ गए। अपने महल व अपने इस मायालोकं की बर्बादी देखकर राकल पहले ही अधमरा हो रहा था सरदार कोलाबा की हरकर्तों को देखकर उसके होश ही उड गये।
सरदार कोलाबा के हरकारों ने उसे देखते-ही-देखते जजीरों मे जकड़ लिया और फिर जिस तरह काले चिराग को लै जाया गया था-बैसै ही राकल को ले जाया गया और उसे सरदार कोलाबा के सामने ले जाकर डाल दिया गया।
सरदार कोलाना ने अपने लम्बे वालों पर हाथ फेरा और मुस्कराते हुए बोला-- "आओ, फरेबी! "
"सरदार कोलाबा देवा काली की कसम मैने कोई फरेब नहीं दिया । "
"देख़, देवा काली की अगर झूठी कसम खाएगा तो में तुझे छोडूंगा' नहीं। अभी खत्म कर दूगा'।"
“में सच कहता हूं सरदार । मैंने तुझसे जो वायदा किया था वह मैं हर कीमत पर पूरा करता। मै सूरज निकलते ही काला चिराग क्रो लैकर यहां पहुच जाता, लेकिन 'मुक्ति द्वार' पर बेशुमार भेडियों, ने मुझ पर हमला कर दिया और मुझे घसीटते हुए ले गये। रास्ते में मैं जख्मी कीं पीड़ा बर्दाश्त न कर सका और बेहोश हो गया और जब मुझे होश आया तो बहुत देर हो चुकी थी । अब सरदार तू ही बता कि इसमे मेरा क्या कसूर है?"
“तेरे बारे में काला चिराग सही कहता है कि तू बड़ा 'ख़ब्बीस' है I तूने वाकई बढी… शानदार कहानी गढी, है और ऊपर से देवा काली की कसम भी खा ली है । "
"मैं सच कहता हूं सरदारा तू मेरा यकीन क्यों नहीं करता?"
”चल, कहता होगा तू सच । अब में क्या… कहूँ । तू वक्त पर नहीं पहुचा', लिहाज वो हो गया जो होना चाहिये था।”
"तुने मुझे कही का न छोड़ा-विल्कुत्त तबाह कर दिया । " राकल ने जेसे प्रलाप किया।
”तू जानता है कि काला चिराग हमारा कितना खास और महत्त्वपूर्ण आदमी है। तूने उसे क्या सोचकर कैद किया?”
"वस सरदार I गलती हो गई मुझसे । मुझे माफ कर दे । " राकल दीन भाव से बोला ।
" माफी। " सरदार कोलाना ने एक पैशाचिक कहकहा लगाया--”जरूर! ! पर तुझे सिर्फ एक ही सूरत में माफी मिल सकती है । "
"वह क्या? "
"तुझे वकाल से हाथ धोने पडेगी। "
"क्या तुझे वह पसन्द आ गई है? क्या तू उससे शादी करना चाहता है, सरदार? " राकल ने तेजी से पूछा I इस पर सरदार कोलाना ने फिर एक जोरदार कहकहा लगाया, फिर बोला--"अहमक I "
राकल ने उसे उलझी उलझी निगाह से देखा--”में समझ नहीं। "
"तू समझेगा भी नहीं । मैंने तुझे अहमक यूं ही नहीं कह दिया । अरे बेवकूफ वह काले चिराग की मुहब्बत है । तुझे बकाल को उसके लिए छोडना होगा ।"